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अच्छा कहें कैसे

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घर मे कोई खुशी की बात हो तो पार्टी में  मुर्गा और शराब, और अगर कोई ग़म की बात तो उस ग़म को भुलाने के लिए मुर्गा और शराब की पार्टी। मतलब ये कि मुर्गे को तो हर हाल में हलाल होना ही है। आज देश में इंसान की हालत मुर्गे जैसी ही हो गयी है। कहीं शादी में खुशी में चलाई गई बंदूक की गोली से भी लाशें गिर जाती हैं तो कहीं चुनाव में जीतने की खुशी में दंगा फसाद कर लाशें बिछा दी जाती हैं। इन दिनों हमारे देश महामारी की वजह से लाशों की वैसे भी कमी नहीं थी फिर बेवजह दंगा फसाद और आगजनी करके इंसानियत की फसल को क्यों पलीता लगा दिया बंगाल ने। कहा जाता है जीत, प्रसिद्धि और धन की ऊष्मा को पचाना बहुत मुश्किल होता है जिसने इसे पचा लिया समझो इंसान से भी ऊपर देवता हो गया। अब तो बंगाल की धरती के किसान को अपनी खड़ी लहलहाती फसल को देखकर खुश होना चाहिए उसकी रक्षा करनी चाहिए, जिससे पूरे देश और परिवेश में ये संदेश जाए कि यह धरती आज भी विवेकानंद और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की धरती है। कोरोना के आने वाले खतरे से सूबे को बचाने का यत्न करना चाहिए। कहीं अस्पतालों में बेड, दवाइयां, इंजेक्शन या ऑक्सीजन की ऐसी किल्लत न हो जाये जै

आओ बच्चों से ही सीख लें

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आइए, बच्चों से ही कुछ सीखें...🧑‍🦱🧑‍🤝‍🧑🤗 उदाहरण-1 गाज़ियाबाद निवासी श्री कृष्ण मित्र जी का प्रपोत्र अगस्त्य उम्र 5 वर्ष। कोरोना की दूसरी लहर में 10 दिन पूर्व उसके पापा पॉजिटिव होगये। वो जिस दिन से घर के एक कमरे में आइसोलेट हुए तो अपने पिता का लाडला होते हुये भी खुद अपने पिता से दूर-दूर रहा, मिलने तक नहीं गया। कुछ दिन बाद उसकी मम्मी भी पॉजिटिव हो गयी तो वह स्वतः ग्राउंड फ्लोर पर अपने दादा दादी के पास सोने लगा। पिछले 3 दिन से श्री कृष्णमित्र जी सपत्नीक पॉजिटिव हुए तो दिन भर उनके कमरे में रहने वाले अगस्त्य ने उनके कमरे से भी मुँह मोड़ लिया। ये सब किसी ने उसे कुछ बताया नहीं स्वयं ही घर मे होने वाली चर्चाओं को अपने अबोध मन में बिठाता रहा। परसों जब उसके दादा उसके परदादा श्री कृष्णमित्र जी के कमरे में उनका हाल जानने चले गये तो उसने अपनी दादी को साफ शब्दों में कह दिया-दादी, दादू बड़े दादू के कमरे में चले गए हैं उनको कोरोना है, अब वो आपके कमरे में आएंगे तो मैं अब आपके कमरे में नहीं आऊंगा। ये कहकर वह पिछले दो दिन से घर के कुक्स (रसोइयों) के साथ ही रह रहा है उन्ही के पास सो रहा है। उदाहरण-2 मेर

रंग भरना जानता हूँ

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चुनाव भी हो चुके, परिणाम भी आ चुके, हार जीत भी हो चुकी, जिन्हें आंसू मिले उनके प्रति संवेदनाएं और जिनको मुस्कानें नसीब हुईं उन्हें बधाइयां। अब तो कोई काम नहीं हैं हमारे सिस्टम पर? अगर थकान उतारने का बहाने से सोने जा रहे हो तो कृपया अब रहम खाओ। अब इस उजड़ते हुए गुलशन की तरफ भी देख लो, जहां न जाने कितनी कलियों और फूलों की पंखुरियाँ बेजान होकर इसकी सुंदरता को कुरूप कर रही हैं। इन पौधों की जड़ों में सहानुभूति के पानी की ज़रूरत है, इन्हें जीवन दायी दवाइयों जैसी खाद की सख्त ज़रूरत है, इनके लिए शुद्ध वायु के रूप में ऑक्सीजन की बहुत आवश्यकता है। आइए, सख्त चाबुक चला दीजिये उनकी पीठ पर जो इस उपवन की सुंदरता को खराब करना चाहते हैं, सबक सिखा दीजिये उन सभी लोगों को जिन्होंने आपदा को अवसर में बदलने के गलत मायने निकाल कर मानवता को शर्म सार कर दिया है।  बुरा मत मानिए शिकायत बगीचे के माली से ही की जाएगी। हृदय की तकलीफ को वर्तमान से ही कहा जा सकता है, अतीत से नहीं। अब सारी मिथ्या ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर इंसानियत को बचाना आपका पहला धर्म है। अगर ये बची रही तो रंग बिरंगे फूलों के इस उपवन का माली होने पर आप

मज़दूर दिवस

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कोरोना काल की पहली परेशान करने वाली लहर रही हो या दूसरी झकझोर देने वाली लहर , सबसे अधिक प्रभावित हुआ है तो सिर्फ मजदूर, रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाला, रोज मेहनत करके खाने वाला, रोज पसीने से नहाने वाला वो मजदूर जिसके श्रम से हमारी ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं खड़ी हैं जिनमे बैठकर हम ऐसी में अपना पसीना सुखाते हैं। इन मजदूर वीरों को न किसी से कोई स्पर्धा है न किसी से आगे निकलने की लालसा। न कोई चिंता और न ही ललक, फिक्र है तो बस इस बात की कोई सुबह ऐसी न आये जिस दिन उसे खाली बैठना पड़े। मजदूर का बेटा अपने पिता को जब मेहनत करते हुए देखता है तो वो उतनी ही मेहनत करता है चाहे वो शारीरिक श्रम हो या मानसिक श्रम। हज़ारों में एक कोई अगर पढ़ लिख कर नोकरी भी करेगा तो वहां भी पूरी ईमानदारी होगी और पूरा श्रम होगा। आज 1 मई है अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस। उन सभी श्रमिकों के स्वेद को नमन करता हुआ एक गीत..  #InternationalLabourDay #मजदूर_दिवस #विष्णुलोक

कोरोना ने गीतों के हिमालय को निगल लिया

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सिकंदराराऊ- कोरोना के इस क्रूर काल ने इस बार हमारे साहित्य जगत को बहुत क्षति पहुँचाई है। उपन्यासकार नरेंद्र कोहली, गीतकार राजेन्द्र राजन सहित 15 छोटे बड़े कवियों को अपना ग्रास बनाने के बाद आज दोपहर हिंदी काव्य मंच के गीत शिरोमणि डा. कुंवर बेचैन जी को भी हमसे छीन लिया।श्री बेचैन जी नोएडा के कैलाश हॉस्पिटल में पिछले एक सप्ताह से कोरोना वायरस से लड़ रहे थे, एक बार को तो ऐसा लग रहा था कि जंग जीतकर घर आ जाएंगे लेकिन कल दोपहर बाद फिर से हालत बिगड़ी और वह हमें हमेशा के लिए बिलखता छोड़ गए। सिकंदराराऊ से मेरे कारण उनका एक रिश्ता से बन गया था। हमारे सरला नारायण ट्रस्ट के द्वारा आयोजित प्रथम समारोह में वह श्री बलराम श्रीवास्तव को सम्मान देने के सादर पधारे थे। उनके दिवंगत होने से मुझे व्यक्तिगत बहुत नुकसान हुआ है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे सिर से आशीषों का हाथ चला गया हो। वो अक्सर कहा करते थे कि तुम्हारे रहते हुए हमें गीत की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। मैं अपनी ओर से तथा सरला नारायण ट्रस्ट की ओर से दुखी मन से डॉ.कुंवर बेचैन जी को अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देता हूँ।

तीरगी दो चार दिन की है

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हर तरफ उदासियाँ ही उदासियाँ, अंधेरे ही अंधेरे। नकारात्मकता ने जैसे चारों ओर डेरा डाल दिया हो। हर सुबह सोशल मीडिया पर जाने में डर लगता है। बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक की आंखे रो रो रोकर रीती हो चली हैं। अपनों के खो जाने का जितना गम है उससे अधिक उन हैवानों की पैशाचिक प्रवृत्ति पर घृणा हो रही है जो ऐसे समय मे भी लाशों के ऊपर जश्न मना रहे हैं। अस्पतालों में डमी पेशेंट लिटा कर शो कर रहे हैं कि हमारे यहां कोई बेड खाली नहीं है। जिस मरीज को देख कर लगता है ये लाखों रुपया खर्च कर देगा उसको तुरंत सारी सुविधाएं मुहैया हो जाती हैं। इंजेक्शन की मुंह माँगी कीमत लेने पर नकली इंजेक्शन देने पर भी इनके अंदर की पशुता रोती नहीं है।...दानवो, समय एक जैसा नहीं रहता, हर रात के बाद सवेरा आएगा, हर अंधेरा रोशनी लेकर आता है, हर आंसू के पीछे मुस्कुराहट छिपी रहती है। समय  उनको कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने इस आपदा में मनुजता की खिल्ली उड़ाई है। इतिहास उन्हें याद करेगा जिन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक एक दूसरे की मदद कर इंसानियत को बचा लिया है। अन्य मुद्दों को तो बाद में बैठ कर भी निपटा लिया जाएगा लेकिन इस

मंथरा मिल जाएगी/ कोरोना विशेष

आजकल हर सुबह बड़ी डरावनी होती जा रही है. लोग बेबस हैं. अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन सिलेंडर मिल जाना मानो वरदान से कम नहीं है. पूरा समाज भी एक हो गया है बस कुछ लोगों को छोड़कर जो इस समय में भी मुनाफा कमाने के लिए ईमान बेचे दे रहे हैं. सब एक दूसरे की मदद कर रहे हैं, जैसे भी हो पा रही है. काफी लोग ऐसी स्थिति में बेचैनी पैदा करने का काम कर रहे हैं. मैंने पहले भी कहा कि इस समय व्यवस्था को कोसना  व्यर्थ है क्योंकि यह व्यवस्था हम लोगों ने ही खड़ी की है. और इस आपदा में तो आपका देश क्या, कोई भी देश होता वो बिखर जाता.  समय है नागरिकों को अपने दायित्वों को समझना. एकजुट रहना. अफवाहें ना फैलाना. और हां, वैक्सीन मौका मिलते ही लगवा लीजिए. इस समय यही घिसी पिटी बातें समझाई जा सकती हैं. और आपको इन्हीं को सुनना है और इन्हीं का पालन करना है. अफवाहें और बेचैनी पैदा करने वाले हर ज़रिए को दूर रखिए चाहें वो कोई पत्रकार हो, नेता हो या आपका कोई दोस्त. तुरंत ब्लॉक मारिए. यह समय मेरी पार्टी और तेरी पार्टी करने का नहीं है. एक ही मकसद रखिए कि जैसे भी हो पाए मदद करना है और न कर पाएं तो अपने काम से काम रखिए और ईश्वर