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रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा.......

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा , एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं। तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं। मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये , आस मन में लिये प्यास तन में लिये कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये , तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ , ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं। मैं तो होली मना लूँगा सच मानिये तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो , मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा तुम मुझे मेरे पँखों को आकाश दो , उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम , यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं। आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं , जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी, कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो , मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर-- कलाई गुनगुनाती है.......

दिल के बगीचे से महक रिश्तों की आती है। सावन लगते ही कलाई गुनगुनाती है॥ माँ का आँचल मुझे देश हित भक्ति सिखाता हरदम , बापू का आशीष युद्ध में शक्ति दिलाता हरदम , सीमाओं की रक्षा करते प्राण निछावर कर दूँ , बहना की राखी का धागा यही बताता हरदम , शायद याद कर रही होगी , हिचकी आती है॥ दिल........... रो मत बहना जंग खत्म होते ही आ जाऊँगा , तुझे बिठा कर झूले में मैं मल्हारें गाऊँगा , आसमान के तारे सारे करूँ निछावर तुझ पर चन्दा की डोली में साजन के घर भिजवाऊँगा , जा , हँस कर के घर के अन्दर , माँ बुलाती है॥ दिल............ मेरी कागज़ की कश्ती को पानी पर तैराना , मेरे बस्ते को भी अपने कंधे पर लटकाना , छीन-छीन कर मेरी टाफी बिस्किट भी खा जाना , मेरी गलती होने पर भी माँ से खुद पिट जाना , यादों की तितली हाथों को छू , उड जाती है॥ दिल.............. सरहद पर दुश्मन के खूँ से होली मन जाती है , बम की आवाज़ें अपने संग दीवाली लाती है , अपने सब त्योहार यहाँ पर यूँ ही मन जाते हैं पर रक्षाबन्धन पर तेरी याद बहुत आती है , आँखों के सागर की गागर छलछलाती है॥ दि...

मन हल्का कर डाला.....

एक तुम्हारे फोन ने मेरा भारी मन हल्का कर डाला। दर्द जमाये जड बैठा था एक छुअन ने सब हर डाला॥ अनहोनी ना दस्तक दे दे कदम-कदम पर डर लगता था , घर में सब रहते थे फिर भी सूना सूना घर लगता था , सुख का अपना घर होता है , उसको भी कर बेघर डाला। दर्द जमाये जड बैठा था एक छुअन ने सब हर डाला॥ एक स्वाद के लिये जनम भर अपनी भूख सहेजी मैंने , तृप्ति मिलेगी इसीलिये बस प्यास की पाती भेजी मैंने , दर्द जमाये जड बैठा था एक छुअन ने सब हर डाला॥ बिना विचारे दिल पर प्रेम का लिख ये ढाई आखर डाला। आँखों के इस कोप भवन में रेगिस्तान है सपनों का , इन उधार की नींदों में बस एक भरोसा अपनों का , छलक रहे क्यों इन नयनों में , इतना गंगा जल भर डाला। दर्द जमाये जड बैठा था एक छुअन ने सब हर डाला॥

थ्री ईडियेट्स

आज बहुत दिनो बाद घर पर ही अपने डी.वी.डी प्लेयर पर थ्री ईडीयेट्स देखी। अपने उद्देश्य मे पूरी तरह से कामयाब ये फिल्म जब मै अपने पूरे परिवार के साथ देख रहा था तो उस समय मैं दो पीढ़ीयों के बीच सोछ में आये हुये बदलव में उलझा हुआ था। मेरी श्रीमती जी की नींद से बहुत अच्छी दोस्ती है इसलिये वो तो पाँच मिनिट बाद ही अपने दोस्त के साथ चली गयीं , लेकिन मुझे अकेला छोड़ गयीं मेरे समझदार होते हुये दोनों बेटों के बीच....। आज दोनों ही मुझे ये फिल्म दिखाने में इतनी क्यों उत्सुकता दिखा रहे थे ये बात मेरी समझ में तब आयी जब फिल्म खत्म हुयी। आदमी के अन्दर जो टेलेंट है या जो प्रभु को उससे कराना है वो कभी न कभी होकर रहता है ज़रूरत है तो उसे सही समय पर पहचानने की। मुझे शुरू से ही संगीत और साहित्य से लगाव था , लेकिन न तो मैंने और न ही मेरे माता पिता ने इसको पहचानने की कोशिश की , और बना दिया मुझे डाक्टर। आज कौन सी चीज़ मेरे काम आ रही है ये दुनिया जानती है।लेकिन अपने दोनो बेटों के साथ ये अन्याय मैं नहीं होने दूँगा। एक एस.एम.एस. मेरे पास आया था जिसमें भगवान बन्दे से कहते हैं कि बन्दे , तू वही करता है जो त...

डा. विष्णु सक्सैना के बारे में राय .......

डा . विष्णु सक्सैना एक ऐसे कवि का नाम है जो कुछ वर्षों पहले सावन के बादलों की तरह उमडा और पूरे देश पर कुछ इस तरह बरसा कि हर काव्य प्रेमी का मन सदा सदा के लिये उसकी रस धारा में डूब गया। शायद ही अन्य कोई ऐसा कवि हो कीर्ति के उच्च से उच्चतर शिखरों पर इतने कम समय में पहुँचा हो जितने कम समय में विष्णु पहुँचे हैं। इसका कारण सिर्फ उनका मधुर कंठ ही नहीं अपितु उनकी सहज युवकोचित प्रणयानुभूतियाँ हैं जो नये - नये बिम्बों , प्रतीकों और उनकी सहज सरल भाषा में व्यक्त होकर सीधे हृदय पर चोट करती है। उनकी भाषा का प्रवाह और उनका स्वर सँयोजन एक झरने के समान है जिसमें बडे - बडे तैराकों के पाँव उखड जाते हैं और वे उसमें डूबने के लिये विवश हो जाते हैं। कुछ समय से पिछली पीढी के लोकप्रिय गीतकारों में से कुछ के दिवंगत हो जाने और कुछ के मौन हो जाने के कारण ऐसा लगा था कि हास्य रस प्रधान कविताओं की बाढ में गीत जीवित नहीं रह सकेगा लेकिन विष्णु क...