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मन नहीं लगता किसी भी शहर में................

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छोड कर जब से तुम्हारा शहर हम आये मन नहीं लगता किसी भी शहर में। फूल जितने भी सजे गुलदान में नागफनियों से सभी चुभने लगे, जो कभी करते हवा से गुफ्तगू रास्तों पर वो क़दम रुकने लगे, जिस नदी तट पर मिला करते थे हम अक्सर डूबता अब मन उसी की लहर में । आँख क्या करती उसी के घाट पर स्वप्न सारे अश्रु पीने आ गये, गर्मियाँ खुद बर्फ सी जमने लगी सर्दियों को भी पसीने आ गये, रात में झुलसा रही है चाँदनी तन मन दर्द दूने हो गये दोपहर में । जब भी आते हो खयालों मे मेरे महकने लगता है मेरा तन बदन, एक गज़ल कह दूँ तुम्हारी शान में उस समय तेज़ी से चलता है ज़हन, मेरे मतले और मक्ते में तुम्ही तुम हो शेर सारे हैँ तुम्हारी बहर में ।

द्वार के सतिये..............

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जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना , द्वार के सतिये तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में॥ हाथ से कांधों को हमने थाम कर साथ चलने के किये वादे कभी , मन्दिरों दरगाह पीपल सब जगह जाके हमने बाँधे थे धागे कभी , प्रेम के हर एक मानक पर खरे थे हम , बैठ ना पाये न जाने क्यों परीक्षा में | हम जलेंगे और जीयेंगे उम्रभर अपना और दिये का ये अनुबन्ध है , तेज़ आँधी भी चलेगी साथ में पर बुझायेगी नहीं सौगन्ध है , पुतलियाँ पथरा गयीं पथ देखते पल-पल , आँख को शायद मिला ये मंत्र दीक्षा में। अक्षरों के साथ बंध हर पँक्ति में याद आयी है निगोडी गीत में , प्रीत की पुस्तक अधूरी रह गयी सिसकियाँ घुलने लगीं सँगीत में , दर्द का ये संकलन मिल जाये तो पढना , मत उलझना तुम कभी इसकी परीक्षा में।

वासंती मौसम भी पतझड़ से हो गये......

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आँखों में पाले तो पलकें भिगो गये। वासंती मौसम भी पतझड़ से हो गये॥ बीते क्षण बीते पल जीत और हार में , बीत गयी उम्र सब झूठे सत्कार में , भोर और संध्या सब करवट ले सो गये। आखों... जीवन की वंशी में साँसों का राग है , कदमों में काँटे हैं हाथों में आग है , अपनों की भीड़ में सपने भी खो गये। आँखों .... रीता है पनघट रीती हर आँख है , मुरझाये फूलों की टूटी हर पाँख है , आँधियों को देख कर उपवन भी रो गये। आँखों... कितना अजीब फूल काँटे का मेल , जीवन है गुड्डे और गुड़्यों का खेल , पथरीले मानव को तिनके भिगो गये। आँखों....

सर्वेश एक--रूप अनेक.....(अमेरिका के संस्मरण--2011)

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- अभी तक मेरी व्यक्तिगत परख सीमित थी सर्वेश के बारे में , मैं यही जानता था कि वो एक व्यंग्यकार हैं लेकिन इस बार जब यू. एस. और कनाडा की यात्रा में 35 दिनों का साथ रहा तब मालूम पडा कि इन महाशय में तो कई सर्वेश अस्थाना चुपचाप छिपे बैठे हैं , उन्हें देख कर मेरा भी नज़रिया बदला और प्रवीन की सोच भी.....। निदा साहब ने कहा भी है कि- हर आदमी में रहते है दस बीस आदमी , जिसको भी देखना हो कईबार देखिये । - ये व्यक्ति बाहर से जितना परिपक्व दिखायी देता है उतना ही अन्दर से मासूम है , इसके अन्दर एक नटखट बच्चा है जो हर वक्त शरारत करने के अवसर ढूँढता रहता। कई अवसरों पर ऐसा देखा गया कि माहोल बहुत गम्भीर है लेकिन इनके आ जाने से वो प्रफुल्लित हो गया। - सोने के मामले में हम दोनों की नींद के बराबर सोने वाले इन महाशय का जबाब नहीं। चाहे वो हवाई जहाज हो , कार हो , ट्रेन हो , बस हो या फिर 10 मिनिट की यात्रा वाली फेरी , भाई साहब मोका मिलते ही नींद को निराश नहीं करते थे। इसका कारण इनसे पूछा तो कहते भाई साहब मैं क्या करूँ ? नींद इतनी बेशर्म है कि बिना बुलाये चली आती है , अतिथि का सम्मान हमारा धर्म है। ...

अमेरिका के संस्मरण--2011.....(जब परदेसी विश्वविद्यालय में अपना हिन्दी विभाग दिखा.....)

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नार्थ केरोलाइना- मिडलेंड से प्रोग्राम करने के बाद हम तीनो हवाई जहाज से IHA की एक स्तम्भ राले धरम में श्रीमती सुधा ओम धींगरा के निवास पर पहुँच गये। यहाँ हमको 4 दिन रुकना था। यहाँ की मेहमान नवाज़ी के सभी कवि कायल हैं। खाने से लेकर सोने तक की सारी सुविधाओं का बड़ी बारीकी से ध्यान रखा जाता है यहाँ । बहुत बड़ा घर , बहुत सुन्दर साहित्यिक माहोल और बहुत बुद्धिमान और सीधे-सादे से सुधा जी के हमसफर पति श्री ओम जी। बहुत मन लगता है सभी भारत से गये हुये कवियों का , इस घर में। सुधा जी अपने प्रोग्राम को सफल बनाने के लिये अपनी मज़बूत टीम के साथ मन प्राण से लगती हैं , इसलिये अपने मक़सद मे सफल हो जाती हैं। हर बार की तरह इस बार भी कवि सम्मेलन सुपर हिट हुआ। सफलता के मद में खूब छक कर भोजन किया और खूब सोये। अगले दिन घर में ही बने खूबसूरत थियेटर में पडोसन देखी। हर गाने पर हम तीनों ने खूब नृत्य किया। अगले दिन सुधा जी से हमने आग्रह किया कि हम लोग अमेरिका की सबसे प्राचीन यूनिवर्सिटी घूमना चाहते हैं। उन्होंने वहाँ के प्रोफेसर अफरोज़ ताज़ और जान काल्वेल्ट से कह कर सब तय कर के हमें खुद वहाँ लेकर गयीं। आज उनक...

अमेरिका के संस्मरण--2011..... (जब कोशिकायें धड़क उठीं.....)

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इस बार शिकागो में हमारे एक मित्र बबराला निवासी आकाश शर्मा के बड़े भाई सुदेश शर्मा और उनकी भाभी श्रीमती रचना मिश्रा(एटा निवासी) से पहली बार मुलाकात हुई। ये दोनों ही पति-पत्नी बायोटेक्नोलोजी में शोध करने के बाद शिकागो में एक प्रतिष्ठित अस्पताल में साइंटिस्ट हैं। शिकागो शहर में पहुँचने से पहले ही इनके घर जाने का प्रोग्राम तय हो चुका था। जिस दिन कवि सम्मेलन था उस दिन तो ये लोग अपनी व्यस्तताओ के कारण नहीं आपाये लेकिन अगले दिन प्रात: 9.30 पर दोनों लोग मुझे ले जाने के लिये होतल आगये। उस दिन सुबह से ही मौसम खराब था , तेज़ हवाओं के साथ तेज़ बारिश अपना रंग दिखा रही थी। रास्ते भर गप-शप करते हुये 30 मिनिट बाद हम लोग डाउन टाउन स्थित फ्लेट पर आ गये। रास्ते में सुदेश मुझे जितने जटिल लगे , रचना उतनी ही सरल लगीं। घर में एक बहुत प्यारी सी 8 माह बच्ची थी जिसकी देखभाल गुजरात की एक आया कर रही थी। भारी नाश्ता करने के बाद मुझे लेकर मिशीगन लेक के किनारे ले जाने के लिये जैसे ही बाहर आये , तेज़ हवाओं ने पूरे शरीर को हिलाकर रख दिया।10 कदम चलने के बाद मैंने अपने स्वास्थ्य को देखते हुये आगे चलने के लिये अपनी अस...