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अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-4

15 जनवरी 2018


आज हमारा विदाई का दिन था। कुछ सामान रात को ही पैक कर लिया था शेष सुबह उठकर जल्दी जल्दी समान जमाया। कल की ट्रिप से कोई संतुष्ट नहीं लग रहा था। न ही जितेंद्र, न ही शिवि और न ही स्वयं पाठक जी। आज सोमवार था, काम का दिन, आज बॉस आने वाले है इसलिए जितेंद्र ने कल ही हमसे विदा ले ली थी।  बहुत भावुक थे जब वो हमसे जुदा हुए । इन तीन दिनों में जितेंद्र ने हम लोगो का साथ एक पल को भी नहीं छोड़ा। खूब सहयोगी भूमिका में रहे, संस्था के लिए भी और हमारे लिए भी।


आज साढे नो बजे हम लोग नाश्ता करके अपना सामान लेकर नीचे आगये। यूँ हमारी फ्लाइट शाम को 5 बजे थी लेकिन पाठक जी शायद कल की कमी पूरी करना चाहते थे। दोनों गाड़ियों में जैसे ही समान रखना शुरू किया तभी तरुण वशिष्ठ जी होटल में आगये। और घर चलने का आग्रह करने लगे। उन्होंने बताया उनका बेटा बीमार है और वो हम लोगों से मिलना चाहता है। मैं खुद को रोक नहीं सका ये सुनकर। प्रवीण और पाठक जी की सहमति ली और सभी लोग चल दिये उनके आवास पर। रास्ते मे हम टेम्पल स्ट्रीट से गुजरे। तंजानिया देश मे इस मार्ग पर मंदिर, मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा सभी हैं। आर्य समाज का बहुत बड़ा स्थान है। हम लोग एक भव्य मंदिर में प्रवेश हुए बहुत बड़े क्षेत्रफल में यह बना हुआ है। यहां राम, कृष्ण, शिव, गणेश, तिरुपति, जगन्नाथ आदि के मंदिर हैं। सभी की बहुत भव्य प्रतिमाएं हैं। क्रमशः सभी का आशीर्वाद लेकर हम लोग तरुण जी के आवास पर गए उनके बेटे को देखने। जैसे ही उसे मालूम हुआ हम लोग उससे मिलने आने वाले हैं। अपने बिस्तर से उठ बैठा  और हमारे साथ फोटो लेने के dslr केमरा तैयार कर लिया। 10 मिनिट उनके घर बैठे , शर्बत पिया और आगे के लिए चल दिये।


हमारे थोड़ी देर के लिए ही आने से उनके परिवार के चेहरे पर रौनक आगयी। शिवि हमारा समान लेकर अपने प्रतिष्ठान जा चुके थे। अब हम लोग और पाठक जी ही रह गए। हमने पूछा कि अब हम लोग कहाँ जा रहे हैं। तो पाठक जी ने रहस्य खोला कि कल आप को हम ठीक से घुमा नहीं पाए थे इसलिए आज हम आपको यहां के सबसे खूबसूरत रिसोर्ट  और सबसे खूबसूरत बीच पर ले जा रहे हैं। आज आप के पास 3 घंटे है खूब सागर की लहरों के आनंद लीजिये यहां के समंदर से आपको भय नहीं लगेगा। यहीं हम लोग लंच लेकर आगे बढ़ेंगे।
25 मिनिट की ड्राइव के बाद हम लोग उस खूबसूरत जगह आगये जिसका जिक्र अभी किया गया।







वास्तव में बहुत सुंदर रिसोर्ट था। बहुत सुंदर जगह। किसी गुजराती का था शायद। हम लोगों ने अपने नहाने के कपड़े पहने और चल दिये बीच की तरफ। सचमुच बहुत लुभावना बीच था। आज आश्चर्य की बात ये की 70 वर्षीय देवेंद्र पाठक जी भी तैरने की मुद्रा में आ गये थे। उन्हें देख कर मुझ जैसे न तैरने वाले को भी हौसला मिला। समंदर में जाने से पहले नारियल वाला दिखाई दे गया। सबसे पहले एक एक नारियल पानी पिया, गला तर किया। 





फिर पांचों लोग समंदर में प्रवेश करने लगे। ये किनारा बहुत गहरा नहीं था इसलिए देवेंद्र जी तो बहुत अंदर तक चले गए उनके उकसाने पर प्रवीण भी उनके साथ चले गए लेकिन हम तीन डरपोक घुटने तक पानी मे ही जाकर नहा लिए। बहुत मज़ा आया। बहुत देर जल क्रीड़ा की।

 





फिर स्विमिंग पूल में फ्रेश पानी से नहाने के बाद कुछ तारो ताज़ा हुए। आज लग रहा था तंजानिया में आकर कुछ विशेष आनंद आ रहा है। संजना अक्सर बच्ची की तरह व्यवहार करती थी जब भी अलग अलग पोज बनाकर फोटो खिचाती थी तो बहुत भली लगती थी।








अगर एक बात सच कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी। अगर संजना और वंदना हम लोगों के साथ न होतीं तो शायद हम इतना सब कुछ घूम भी न पाते। इन लोगों के घुमाने के चक्कर मे हम लोगों ने तंजानिया की आबो हवा देख ली। हम लोग विदेश इतना घूम चुके हैं कि अब कोई नई चीज देखने के प्रति कोई उत्सुकता नहीं है। इसलिए हम इन दोनों नारियों के बहुत आभारी हैं। जिन्होंने हमे तंजानिया घुमा दिया।

समय खिसकता जा रहा था। लंच का ऑर्डर नहाने से पहले जी दे दिया था। नहाने के तुरंत बाद तेज भूख लग रही थी। लंच भी तैयार था। भरपेट भोजन कर हम लोग देवेंद्र जी के प्रतिष्ठान पहुंच गए। यहाँ पैनल बनाये जाते है। जो कई देशों में भेजे जाते हैं। बहुत बड़ा कारोबार है इनका। सोलर पैनल से खुद की बनाई बिजली से ही काम करते हैं। ये पूरा व्यवसाय शिवि देखते हैं। पाठक जी का तो सिर्फ सुपरविजन है। शिवि बहुत समझदार, योग्य और सहृदय युवा हैं। कविता की कद्र करना जानते हैं प्रभु ऐसा एक एक पुत्र सबके घर मे दे।

अब हमारे एयर पोर्ट जाने का वक्त हो आया था। दो गाड़ियों और हम, हमारा सामान लेकर एयरपोर्ट के लिए रवाना होगये। थोड़ी देर में ही एयरपोर्ट आगये। मन तो नहीं कर रहा तो कोई किसी को छोड़े। लेकिन हम स्थायी निवासी नहीं थे वहां के इसलिये भारत तो आना ही था। इन चार दिनों में देवेंद्र जी ने हमे पिता या अभिभावक जैसा स्नेह दिया, और शिवि ने एक दोस्त की भूमिका निभाई। कुल मिलाकर सब कुछ अविस्मरणीय रहा। सबने गले लगकर चरण स्पर्श कर हमें विदा किया। और तब तक एयरपोर्ट पर रहे जब तक हम बोर्डिंग गेट पर नहीं पहुँच गए।

इसी बीच एक दुर्घटना हो गयी। एयरपोर्ट के अंदर घुसते ही सामान की जांच के साथ साथ व्यक्ति की जांच भी होती है यहां कुछ अधिक ही सतर्कता वरत रहे थे जैसी दुबई में थी। महिलाओं के मेटल की हर चीज उतरवा ली गयी। हम लोगों के पर्स, बेल्ट मोबाइल, घड़ी। आदि सब। भीड़ बहुत थी इसलिए जल्दी जल्दी सामान समेटा। प्रवीण को एक बैग से दूसरे बेग में सामान शिफ्ट करना था। जिसे लगेज में देना था। ये प्रक्रिया पूरी की बोर्डिंग पास लिया और सुरक्षा जांच के लिए फिर वही प्रक्रिया। एक पल को तो झुंझलाहट होने लगी। खैर ये एक प्रक्रिया है सभी को गुजरना पड़ता है इससे। हम लोग अपने समय से लगभग एक घंटे पहले बोर्डिंग गेट पर पहुच गए। हिंदुस्तानी व्यक्ति को जैसे ही समय मिलता है मोबाइल से खेलने लगता है। मैं और वंदना अपनी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल के फोटो चेक करने लगे। हमे देख कर प्रवीण को सूझा मैं भी देख लूँ। लेकिन देखा तो मालूम हुआ कि मोबाइल है ही नहीं। बेग की सभी जेब तलाशीं, कहीं नहीं। संजना का बैग देखा, उसमें भी नहीं मिला तो प्रवीण के चेहरे पर चिंता झलकने लगी। मैने पूछा तो उसने कारण बताया। मैंने ढांढस बंधाया, हो सकता है बैग में सामान शिफ्ट करते वक्त जल्दी में उधर चला गया हो। लेकिन उसे शक था ये पहली सुरक्षा जांच में वहीं रह गया। अब नियमानुसार वापस लौट नहीं सकते थे लेकिन हम लोगों ने अधिकारियों से परमिशन ले ली। और हम दोनों अंतिम सुरक्षा पॉइंट पर पहुच गए। अपनी बात रखी तो अधिकारी ने ध्यान से सुनी। पहले हम सब के चारों बेग का एक्स रे किए। जब नही ट्रेस हुआ। तो हमने निवेदन किया कि पहले वाले पॉइंट पर हमें चेक कर लेने दें तो उन्होंने मना कर दिया, अपने अधिकारी को भेजा और चेक करवाया। लेकिन वहां भी कोई लावारिस मोबाइल नहीं मिला। अब चिंता बढ़ने लगी। अधिकारियों ने इतना सहयोग किया कि सीसीटीवी कैमरे तक से चैक करा लिया लेकिन कोई सूत्र नहीं मिला। निराश होकर हम लोग वापस आगये। प्रवीण बहुत परेशान थे। होते भी क्यों न। कविता के अलावा उनका कारोबार बड़ा है। अनगिनत कॉन्टेक्ट, लोगों का लेन देन, कविताएं आदि सब कुछ था उस मोबाइल में।

मैंने बहुत सांत्वना दी और भरोसा दिया कि भारत मे जब सामान खोलोगे तो ज़रूर मिल जाएगा। ख़ैर फ्लाइट का समय हो गया । इस अंतिम प्रकरण से बोझिल मन लिए हम जहाज में बैठ गए। 5 घंटे की यात्रा थी दुबई तक की।  भोजन किया, फिल्में देखीं थोडा सोये। फिर आगया दुबई। वही खूबसूरत दुबई एयरपोर्ट।










भारत के समयानुसार रात के 2 बजे थे इसलिये आंखों में नींद भरी हुई थी। यहां से 4 बजे उड़ना था। एयरपोर्ट घूमते घूमते कब 2 घंटे कट गये पता ही नहीं पड़ा। अगली फ्लाइट का समय हो गया। हम लोग फिर से उसी जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद जहाज में आकर बैठ गए। इस बार तो बैठते ही नींद आगयी और हम लोगों की आंख तब खुली जब जहाज टर्मिनल 3 पर लेंड हुआ। जहाज से उतर कर बेल्ट से सामान लिया। प्रवीण ने सबसे पहले अपना सामान इस उम्मीद से चेक किया शायद मोबाइल मिल जाये  लेकिन दुर्भाग्य कि उम्मीद टूट गयी, मोबाइल नहीं मिला। अब तो सब्र के अलावा कोई चारा नहीं था। इन चार पांच दिनों की सभी स्मृतियां समेटे हम सबने एक दूसरे से गले लग कर अपने अपने गंतव्य के लिए विदा ली। 

लेकिन चलते वक्त हमने जब संजना से पूछा कि कैसी लगी तुमको ये विदेश यात्रा। तो मुस्कुराकर वंदना की तरफ मुंह करके बोली- इन्होंने (प्रवीण की ओर इशारा करते हुए) ने करा दी तो कर ली वर्ना हम तो घर बैठे ही थे, क्यो भाभी जी? उसके यह कहते ही हम सब लोग खिलखिला कर हंस पड़े क्यो की संजना का यह वाक्य पूरी यात्रा में हमे आनंद देता रहा था।
 

अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-3


14 जनवरी 2018



आज मकर संक्रांति है
आज भी सुबह हमें चिड़ियों ने ही जगाया। कौवों की काँव काँव का भी शोर सुनाई दे रहा था शायद को कोई कौवा घायल अवस्था मे था। मैं जल्दी से उठा 8 बज चुके थे। प्रवीण को भी फोन से जगाया। रोज की तरह आज भी मैंने ही चाय बनाई। वंदना को हम मेहमान की तरह लेकर आये थे इसलिए उनकी पूरी सुख सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व था। आज भी बैड टी जब तैयार हो गयी तभी उन्हें जगाया।

9 बजे हमारे सिकंदराराऊ के ही तरुण वशिष्ठ और उनकी पत्नी आगये। ढेर सारी आत्मीयता में लिपटा हुआ नाश्ता लेकर। अभी हम लोग नहाए भी नहीं थे। हम प्रवीण और संजना के बिना अकेले नाश्ता करते तो बहुत खराब लगता,और इतना अधिक नाश्ता नहीं था कि उन्हें भी शामिल किया जाता। बहुत दुविधा थी दिमाग में। हमने उनसे निवेदन किया कि आप ये सब यहीं रख जाइये। हम नाश्ता बाद में करके आपके खाली बर्तन घर पहुचा देंगे। दोनों लोग तैयार हो गए इस बात पर। कुछ घर की बात हुईं कुछ गांव की बहुत अच्छा लगा उन्हें भी और हमे भी। उनका आग्रह था हम समय निकाल कर एक बार उनके घर अवश्य आएं। हमने उन्हें आश्वासन देकर विदा किया। फ्रेश हुए तैयार हुए और 10 बजे तक ब्रेक फ़ास्ट के लिए रेस्टुरेंट में आगये। आज हमें कोई काम नहीं था सिर्फ घूमना था पूरे दिन। जो भी अच्छा अच्छा है यहां सब देखना था। थोड़ी देर बाद शिवि, जितेंद्र और पाठक जी तीनो आगये हमे लेने। हम तब तक बिल्कुल रेडी हो चुके थे। बिना किसी देरी के गाड़ियों में बैठ गये। रास्ते से उन्ही राजीव जी को साथ लिया जिन्होंने पाठक जी की सर्वाधिक सहायता की थी किसी ज़माने में। लगभग 25 मिनिट की ड्राइव के बाद हम लोग विजय जी के घर पहुंच गए। वहां चाय पीने के बाद ही आगे बढ़ना था। उनके घर पुण्डरीक जी, रजनीश जी, शालिनी और सुमन पहले से मौजूद थीं।

सभी के साथ चाय ली, और तीन गाड़ियों में बैठकर सभी साथ हो लिए। पूरी कंपनी पिकनिक जैसी लग रही थी। आज का प्लान विजय जी ने बनाया था। गाड़ियां सड़क पर दौड़ने लगीं। आज हम शिवि और पाठक जी के साथ थे, और प्रवीण जितेंद्र एंड कंपनी के साथ। यहाँ की सफारी बहुत फेमस है लेकिन उसके लिए हमें 2 दिन चाहिए थे। इसलिए वो संभव नही हो रहा था। आज हमें कैथोलिक संग्रहालय ले जाया जा रहा था जो इस शहर से लगभग 40 किमी. दूर था। जो हमें ले जारहे थे उन्हें भी इसकी भौगोलिक जानकारी नहीं थी। खैरः जैसे तैसे जीपीएस के माध्यम से उस स्थान पर पहुँच ही गए। बहुत विशाल जगह में यह बना था। सेकड़ो साल पुरानी जगह थी ये। यहां मुस्लिम शासकों का राज था उस वक्त और वो लोग यहां के लोगो को गुलाम बना कर रखते थे। उन पर जुल्म करते थे तथा उन्हें जंजीरो में बांधकर बेचने के लिए लेजाया जाता था। कुछ पेड़ तो सन 1868 में लगे थे और आज भी फल फूल रहे हैं। एक गाइड हमे सब समझाता जा रहा था। लेकिन इतिहास की जानकारी से कई तथ्य सामने आए।





तेज़ धूप में पैदल चलते चलते थकान होने लगी थी। लंच का समय भी होने जा रहा था। हम लोग किसी अच्छे से रेस्टोरेंट की तलाश में घूमने लगे। इस बहाने तंजानिया की गरीबी और गांव दोनों देखने को मिल गए। सड़कें भारत जैसी ही लगीं। यहां चार पहिया टेक्सी की तरह दोपहिया टैक्सी का भी प्रचलन है। लेकिन सड़क के नियम पालन न होने पर तुरंत चालान होता है।

ढूंढते ढूंढते एक रिसोर्ट मिल ही गया यहां लंच की व्यवस्था भी थी। ऑर्डर दे दिया गया। लेकिन इतने लोगो का एक साथ भोजन बनाने में देर लग रही थी। तो हमने तरुण जी का दिया हुआ सुबह वाला नाश्ता खोल लिया। दही बड़े खाये, तिल के लड्डुओं का स्वाद लिया। तो भूख कुछ कम हुई। तभी जितेंद्र बोले गुरु यहां का बीच बहुत सुंदर है तब तक घूम लिया जाए। दिन को कैसे तो ठीक करें। हम लोग रिसोर्ट से सटे बीच पर पहुंच गए। सच मे बहुत सुंदर और शांत सागर था यहां।






समंदर के जल को हाथ से छू कर प्रणाम किया तो उनकी लहरों ने प्रसन्न होकर पूरा बदन ही भिगो कर आमंत्रण दे दिया बोलीं-आओ मेरे आगोश में थोड़ी देर विश्राम कर लो, ये बात कह कर तो लहरें बहला रहीं थीं हमे लेकिन सत्यता तो यही है कि समंदर की लहरें सिर्फ थकान देती हैं। जल से थोड़ी देर किलोल करने के बाद हम लोग साफ स्विमिंग पूल में नहाने के बाद फ्रेश हुए।




खाना खाया। शाम के चार बज चुके थे। त्रिपाठी जी को भी आभास हो रहा था कि आज का दिन ठीक नही गुजरा।
खाना खाया। इसके बाद संस्था के कुछ लोग विजय जी के घर चले गए क्यों कि रात को मकर संक्रांति के कारण खिचड़ी का प्रोग्राम था।अब तय हुआ कि क्रोकोडायल पार्क घूम लिया जाए। 10 किलोमीटर की दूरी पर थी ये जगह। 20 मिनिट में पहुच गए। कोई गांव जैसा था। वहीं पर ये बनाया हुआ था। टिकिट लेकर अंदर गए। ये पार्क ऐसा था जिसमे 3 माह के मगरमच्छ से लेकर 90 साल तक के मगरमच्छ पाले हुए थे। कुछ मादा ऐसी भी थी जो प्रैग्नेंट थीं। 


इस जगह का सबने आनंद लिया।  हम लोग इस जगह 1 घंटे रहे। ऐसा लगा कि आज का दिन कुछ खास हुआ अब। साढे 6 बज चुके थे। हम लोग विजय जी के घर के लिए कूच कर गए। 20 मिनिट में घर आगये। घर पर संस्था के प्रमुख परिवार पहले से ही मौजूद थे। खिचड़ी में अभी वक्त था तो पहले तो चाय पी उसके बाद नटखट जितेंद्र ने महफ़िल जमा दी। सबको एक जगह बिठा लिया और हर व्यक्ति कुछ न कुछ सुनाएगा ये आवश्यक कर दिया। और खुद संचालन की भूमिका में आगया।  शालिनी और सुमनजी ने फिल्मी गीतों से शुरुआत की। शिवि ने बहुत सुंदर कविता सुनाई। पाठक जी ने किसी अच्छे कवि की एक कविता सुनाई। अन्य लोगों ने भी कुछ न कुछ सुनाया। वंदना और संजना पहले ही सलाह करके बैठीं थी कि हमे श्रोता बनना है। अंत मे प्रवीण ने आदित्य जी के कुछ छंद और एक अपनी ग़ज़ल सुनाई। और मैंने एक फिल्मी गीत, एक अपनी कविता और एक फरमाइश का गीत तन तुम्हारा अगर.... सुनाकर। गोष्ठी का समापन कर दिया।


बड़ी मात्रा में निर्मित सभी को खिचड़ी पड़ोसी गयी। साथ मे घी, पापड़, अचार तथा चोखा भी दिया गया। खूब खाई, पेट भी भर गया, थकान भी उतर गई। 11 बज चुके थे, सामान भी पैक करना था इसलिए सभी से भाव भीनी विदाई लेकर हम लोग होटल में आकर अगले दिन का शेड्यूल तय करके सो गये।
क्रमशः....

अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-2


13 जनवरी 2018
विश्व हिंदी दिवस पर कविसम्मेलन

खिड़की के परदों से सूरज की चमक झांक कर पलकों पर पड़ी तो बहुत असहज सी लगी, इग्नोर करके फिर सो गया। लेकिन जैसे ही गौरैया की चहचाहट के स्वर कानों में पड़े तो आँखो की नींद ने भी बगावत कर दी। आंखे मसलते हुए घड़ी की तरफ देखा तो साढे आठ बजे चुके थे। बिस्तर से उठा खिड़की से झांक कर देखा पड़ोसी मुंडेर पर 10-12 चिड़ियां फुदक फुदक कर चहचहा रही हैं। मन प्रफुल्लित हो गया। जल्दी से वंदना को जगाया और फुदकती हुई चिड़ियां दिखाईं। हमारे यहां इन चिड़ियों की नस्ल ही खत्म हो गयी है । पिछले 20 सालों से ये आंगन में दिखना बंद होगयी हैं। खैरः मैंने 2 कप चाय बनाई। एक साथ तंजानिया की भोर का आनंद लिया। फोन करके प्रवीण को जगाया। हम लोग फ्रेश होकर 10 बजे डाइनिंग हाल में नाश्ता करने आगये। थोड़ी देर बाद जितेंद्र और पाठक जी भी आगये। सभी लोगों ने साथ मे नाश्ता किया।

हमारा आज का शेड्यूल था। 2 बजे तक साइट सीन भ्रमण, खरीद दारी, लंच, और शाम के मुख्य कार्यक्रम की तैयारी करना।
नाश्ता करने के बाद 2 गाड़ियों में सभी बैठकर चल दिये तंजानिया के इस सुंदर शहर का भ्रमण करने। आधा घंटे की ड्राइव के बाद हम पहुँच गए "स्लिप वे" । ये इतनी बड़ी जगह है जहां चार पांच घंटे आराम से बिताए जा सकते हैं। यहां 5 स्टार होटल, समंदर का किनारा, संग्रहालय, मॉल, रेस्टोरेंट, और छोटी मोटी दुकानें सब एक ही जगह हैं। पाठक जी बारी बारी से हमे सब दिखाते जा रहे थे सबसे पहले भुतहा पेड़ देखा।



ऐसा बताया जाता है कि रात में इस पेड़ को देख कर डर लगता है। रामसे ब्रदर्स की फिल्मों में इन्ही पेड़ों पर भूत रहा करते थे।
अंदर कुछ दूर जाने पर समुद्र के दर्शन होगये। बहुत सुंदर बीच। अनेकों वोट्स और स्टीमर खड़े थे सागर में। बहुत सुंदर नज़ारा था। हमने भी एक वोट किराए पर ली और एक घंटे तक समंदर की लहरों  घूम घूम कर आनंद लिया। जितेंद्र हम सबको लाइव कर रहे थे। यूपी अंदाज में हमारे इंटर व्यू भी लेते जा रहे थे।




धूप बहुत तेज़ थी पसीने आ रहे थे, वर्ना इस जगह काफी देर ठहरा जा सकता था। कुछ फोटोग्राफी करके हम लोग रेस्तरां में आगये सबने अपनी अपनी पसंद के जूस लिए और फिर से तरोताज़ा हो गए। यहां के फलों में उनका वास्तविक स्वाद देखने को मिलता है। क्यो कि खेती में कोई जैविक खाद का प्रयोग ही नही होता।

वंदना और संजना दोनों ही इस ट्रिप का पूरा आनंद ले रही थी। हर मूवमेंट और हर लोकेशन पर इन दोनों के फोटो लेने के लिए हम दोनों को व्यस्त रहना पड़ता था। 

प्रवीण और संजना संग्रहालय में चले गए। मैं और वंदना जितेंद्र के साथ खरीद दारी करने के लिए दुकानों की तरफ चले गए। हम लोग सिर्फ पसंद कर रहे थे उनसे बात करने का, कीमत पूछने का और उसे कम में लेने का सारा जिम्मा जितेंद्र ने उठा रखा था। बच्चों के लिए कुछ कपड़े और गिफ्ट लेते लेते 1 बज गया। पाठक जी ने चेताया जल्दी करिये अभी उच्चायोग की तैयारी देखने भी जाना है और आप लोगो को लंच भी करना है। हम लोगों ने कीमत चुकाई। इतनी देर में प्रवीण भी आगये। हम लोग उच्चायोग होते हुए शहर में आगये। हमने इच्छा जाहिर की आज हम गुजराती थाली खाएंगे। पाठक जी अपने एक मित्र के गुजराती रेस्टोरेंट में ले गए। स्वादु भोजन के पश्चात हम लोग होटल में विश्राम करने के लिए आगये। कुछ थकान, कुछ भोजन का नशा दोनों की वजह से तुरंत नींद आगयी।



शाम के 6 बजे तक हम लोग सोये। फिर से स्नान किया और तरोताज़ा होकर 7 बजे तक तैयार होकर नीचे आगये। संस्था के कुछ प्रमुख कार्यकर्ता हमे लेने आगये। चाय पीकर हम लोग कार्यक्रम हेतु भारतीय उच्चायोग के प्रांगण के लिए रवाना हो गये। भारतीयों की लेट लतीफी यहां भी दिखाई दे रही यही। 7 बजे का वक्त दिया गया था। साढे सात बजे  तक भी लोग आरहे थे। आज भी कार्यक्रम का संचालन जितेंद्र के हाथ मे था। रोज का नटखट जितेंद्र आज सिल्क के कुर्ते पाजामे में बहुत संजीदा नज़र आरहा था। बहुत ही गंभीरता से संचालन कर रहा था।


धीरे धीरे सभी कुर्सियां भरती जा रहीं थीं।  प्रतीक्षा थी तो बस मुख्य अतिथि उच्चायुक्त संदीप आर्य के आने की। ठीक 8 बजे संदीप जी  पत्नी सहित पधार गए। सभी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। हम लोगों से परिचय कराया गया। देवेंद्र जी की मेहनत को प्रणाम करना होगा कि परदेश में इतने लोगो से संपर्क रखकर इन्हें इकट्ठा कर लेना कोई आसान बात नही है। 400 कुर्सियां पूरी भर चुकीं थीं। दीप प्रज्वलन के लिए मंच से घोषणा की गयी। संदीप जी, स्वर्ण गंगा के अध्यक्ष श्री देवेंद्र पाठक और हमने मिलकर माँ सरस्वती के आगे दीप प्रज्वलन की रस्म अदा करके उन्हें माल्यार्पण किया। 

प्रथम वक्तव्य संदीप जी का हुआ जिसमें उन्होंने इस संस्था की बहुत तारीफ की और भारत के द्वारा किये गए प्रयासों और सहयोग के बारे में बताया।


संस्था के अध्यक्ष श्री देवेंद्र पाठक जी ने संस्था की गतिविधियां बतायीं।इसके बाद शुरू हुए कुछ मनोरंजक कार्यक्रम जो तंजानिया के बच्चों के द्वारा प्रस्तुत होने थे। लगभग 30 अफ्रीकी बच्चे मंच पर एक साथ आये। अलग अलग वेश भूषा में । इनमे से एक अफ्रीकी इमरान नाम के युवा ने हिंदी में बोलकर चमकृत कर दिया। 

उसने अपने 10 मिनिट के भाषण में हम दोनों के बारे में, भारत की संस्कृति के बारे में, तथा दोनों देशों के संबंन्धो के बारे में लड़खड़ाती हिंदी में शानदार बोला। मुझसे न रुका गया मैंने उस बच्चे के लिए खड़े होकर तालियां बजायीं। पूरा पंडाल तालियों से गूंज गया। फिर एक अफ्रीकी नृत्य किया गया। एक हिंदुस्तानी नृत्य तथा भारत को और हिंदी को समर्पित एक समूह गीत प्रस्तुत किया गया। इसके बाद इन सभी बच्चों को समर्पण भाव से हिंदी पढ़ाने वाली और गीत इत्यादि सिखाने वाली सविता मौर्य जी को सम्मानित किया गया। सविता जी पिछले कई वर्षों से न धूप देखतीं हैं न बारिश लगातार अपने 2 छोटे छोटे बच्चों की परवरिश के साथ साथ इन तंज़ानियांन बच्चो को पढ़ा रहीं हैं। सम्मान लेते वक्त मैंने उनके छलछलाते हुए आंसुओं को पढ़ा था। उनमें आभार का भाव भरा था। मेरा मानना है ऐसे लोगों को भारत मे सरकार की तरफ से सम्मानित किया जाना चाहिए।





तत्पश्चात दो स्थानीय कवियों ने कविता पाठ किया। फिर एक एक करके हमारा परिचय देते हुए मंच पर बुलाया गया संदीप जी और देवेंद्र पाठक जी द्वारा हमें सम्मानित किया गया। हम दोनों को  विश्व हिंदी सम्मान से नवाज़ा गया। साथ ही संजना और वंदना को भी बुलाकर संदीप जी की पत्नी से सम्मान कराया गया। हम दोनों की पत्नियां बहुत खुश थी। क्यों कि उनके जीवन मे विदेश की धरती पर इस प्रकार सम्मान प्रथम बार प्राप्त हो रहा था।






इसके बाद जितेंद्र कवि सम्मेलन का माइक प्रवीण को सौंप कर नीचे श्रोताओं में हमे दाद देने के लिए चले गए। जितेंद्र हम लोगों को अनेकों बार भारत मे सुन चुके हैं कहाँ दाद देनी है वो भली भांति जानते हैं। हमारे पास 90 मिनिट थीं। 45 मिनिट की पहली पारी प्रवीण ने खेली, खूब चौके छक्के लगाए, खूब हंसाया और अन्त में भीष्म प्रतिज्ञा सुनाकर गेंद पैवेलियन से बाहर कर दी। लेकिन अगली गेंद पर केवल एक रन लेकर बेटिंग मुझे थमा दी। अगली और अंतिम 45 मिनिट की पारी खेलने के मैं बिल्कुल तैयार था। मेरे लिए बॉल अधिक थी टारगेट कम था। इसलिए धीरे धीरे मुक्तकों के द्वारा एक एक स्ट्रोक पर चार चार रन बनाए। जनता को बहुत मज़ा आरहा था। मैं राहुल द्रविड़ की तरह खेल रहा था। अधिकतर मुझे tv के माध्यम से बहुत देख चुके थे लाइव सुनते हुए बहुत आल्हादित थे। अंत मे अपने दो गीत सुनाकर विजयी स्ट्रोक खेलते हुए शान से हाथ हिलाते हुए स्ट्रमप्स उखाड़ कर ले आये। सभी लोगों ने खड़े होकर हमारा अभिवादन किया।







जितेंद्र ने सभी का आभार प्रकट करने के लिए संस्था के सचिव पुण्डरीक सिन्हा जी को बुलाया। सब लोग बहुत खुश थे। कह रहे थे ऐसा अभी तक नहीं हुआ, लोग अंत तक बैठे रहे और समय का पता ही नही चला कि कब गुज़र गया। ये हमारे लिए उपलब्धि थी। बहरहाल हम लोग सबकी बधाइयां लेने लगे। सेल्फियां ली जाने लगीं। सुबह नाश्ते पर आमंत्रित किया जाने लगा। जैसा कि अक्सर होता है सफल प्रोग्राम के बाद....

इतने अच्छे श्रोताओं के बीच से उर्जित होकर सभी से विदा लेकर हम लोग पाठक जी के साथ अपने होटल के डाइनिंग हॉल में आ गए। खाने का ऑर्डर दिया। पाठक जी प्रोग्राम की सफलता से गदगद थे। खाना खाते खाते हमने पाठक जी की ज़िंदगी के पन्ने पलटने चाहे। पाठक जी भावुक हो गए और धीरे धीरे भारत से तंजानिया आने की और यहां संघर्ष की गाथा उन्होंने जिस तरह हमे सुनाई तो लगा इस प्रेरक व्यक्ति पर तो फ़िल्म बनाई जा सकती है। आज पाठक जी की कहानी सुन कर हम बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बताया अगर राजीव कुमार जी हमे न मिलते तो हम इस देश मे सरवाइव नहीं कर पाते। आज पाठक जी दर ए सलाम के जाने माने उद्योगपति हैं। 
12 बज चुके थे, हम लोग उनसे विदा लेकर अपने अपने कक्ष में सोने चले गए।


अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-१



स्थान- दार एस  सलाम ( तंजानिया)
अवधि- 11 जनवरी से 16 जनवरी तक
मुख्य यात्री- डा. विष्णु सक्सैना, डा. प्रवीण शुक्ल
सह यात्री- श्रीमती वंदना सक्सैना, श्रीमती संजना शुक्ला
आभार- श्री अशोक चक्रधर
अवसर- विश्व हिंदी दिवस
सौजन्य- स्वर्ण गंगा संस्था एवं भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, दार एस सलाम, तनजानिया 


यूँ तो अब तक अनेक देशों की यात्राएं हो चुकी हैं लेकिन इस बार की यात्रा हमारे लिए विशेष इसलिए थी कि हम विदेश में भी अपना घर ले गए थे। यात्रा कमदिनों की थी इसलिए मैंने प्रवीण के सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न हम लोग इस बार अपनी अपनी सह धर्माणियो को साथ ले चलें। तुमने भी अभी अपने पिताको खोया है और मैंने भी अपनी माँ के विछोह में हूँ तो ये यात्रा इस अवसाद से निकलने में हमारी सहायता कर सकती है। वो मेरे प्रस्ताव से सहमत हो गए। वंदना के पास तो पासपोर्ट था लेकिन संजना का पासपोर्ट आनन फानन में बनवाया गया, और हम लोगो ने देवेंद्रजी को बोल दिया कि इस बार हम दो लोग नहीं 4 लोग आएंगे। उन्होंने प्रसन्नता से सहमति दे दी। यलो फीवर आदि के टीके लगाने की औपचारिकताएं समय से पूरी कर ली गईं थी।


11 जनवरी 2018
माँ की त्रयोदशी 8 को समाप्त हुई। माँ पूरे घर और मेरी जिंदगी के एक कोने को रीता कर गयी थी। रिश्तेदार जा चुके थे। बिखरे हुए घर को फिर से सलीके से ठीक करने में 2 दिन लग गए। 11 को हमे ग़ज़िआबाद के लिए निकलना था। क्यो कि रात 3 बजे की फ्लाइट थी। फ्लेट पर पहुच कर थोड़ी देर आराम किया इतनी देर में ही श्री कृष्ण मित्र जी के सुपुत्र हिमांशु लव का फोन आया कि शाम का भोजन हमारे घर है। हम लोग 8 बजे उनके घर जेसे ही पहुचे पूरा घर खुशबू से महक रहा था। घर के सभी सदस्य  आदरणीय मित्र जी , आंटी जी, आँचल भाभी, एकता, मनु और विभूति सभी ने हमारा गर्म जोशी से स्वागत किया और हमे विदेश जाने की बधाई दी। थोड़ी देर में भाभी जी केक लेकर आगयीं, बोलीं कल आपका जन्म दिन है आप रात को ही फुर्र उड़ जाओगे इसलिए हम लोग आज ही आपका जन्मदिन सेलिब्रेट करेंगे।


सबके मन मे असीम आत्मीयता का भाव था। मैंने और वंदना ने केक काटा। सबको खिलाया। सभी की शुभकामनाओ से मैं अभिभूत हो गया।
खाना खाया, बड़ो से आशीर्वाद लिया, एकता कतर एयरवेज में एयरहोस्टेज रह चुकी हैं वो दर ए सलाम जाती रहतीं थीं इसलिए उनसे ज़रूरी जानकारियां ली और अपने फ्लैट पर आगये। समान पैक किया और 12 बजे हम एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए।


12 जनवरी 2018

वाहः क्या टाइमिंग थी। प्रवीण और हमारी। हम दोनों अलग अलग जगह से चले लेकिन एयरपोर्ट पर दोनों की टैक्सियां एक साथ रुकीं।
प्रवीण और हम तो अक्सर मिलते रहते हैं पर वंदना और संजना का व्यग्रता के साथ आलिंगन होना देखने लायक था। संजना के चेहरे पर अभूतपूर्व इकसाइटमेन्ट था। क्यो की उसकी पहली विदेश यात्रा थी, वंदना तो एक बार दुबई हो आयी है।
बहरहाल हम लोग शुरुआती सारी औपचारिकताएं एक घंटे पहले पार कर के बोर्डिंग गेट पर आगये।क्योकि ऑनलाइन बोर्डिंग करा लिया था इसलिए सब काम जल्दी निपट गया।  



लगभग ढाई बज चुके थे, हम लोग वहीँ बैठकर ऊँघने लगे। एक घण्टे बाद बोर्डिंग शुरू हुई और हम लोग अपनी अपनी सीट्स पर बैठ गए। एयर अमीरात की फ्लाइट थी सारी व्यवस्थाएं शानदार। खाया पिया, फ़िल्म देखी और सो गए। हमारा अगला पड़ाव दुबई था। 4 घंटे बाद दुबई आगये। दुबई का एयरपोर्ट दुनिया मे सबसे सुंदर एयरपोर्ट है काफी बड़ा भी। यहां हम चलते चलते थक जाएंगे लेकिन इसका विस्तार कम नहीं होता। 




 यहां से पूरी दुनिया के लिए जहाज उड़ते हैं इसलिए सभी उच्चकोटि की सुविधाओं से सुसज्जित है ये एयरपोर्ट।यहां हमारा ठहराव ढाई घंटे का था। यहां भी चेकिंग बहुत ज़बरदस्त थी। शरीर के वस्त्रों को छोड़कर शेष सभी चीजों को एक्सरे से गुजरना पड़ता है। हमारी दोनों सहयात्रियों को ये बहुत असुविधाजनक लगा क्यों कि सभी गहने उतरवा लिए थे सुरक्षा अधिकारियों ने। सबने एक एक चाय पी और चल दिये अपने मुख्य पड़ाव की ओर। उसी एयरवेज का दूसरा जहाज। वही सीट । लेकिन परिचारिकायें बदल गईं। बहुत थक रहे थे हम लोग। पूरी रात ठीक से सो नही पाये थे। इसलिए नाश्ता लिया और एक फ़िल्म देखी और सोने का अभिनय किया। जैसे तैसे 5 घंटे निकाले। जैसे ही परिचारिकायें मेकअप करके तरोताज़ा दिखीं तो आभास हो गया कि हम तंजानिया पहुच गए हैं।


जहाज से उतरते ही वहां की शुद्ध हवा ने हमारा स्वागत किया। लेकिन गर्मी बहुत थी तापमान 32 डिग्री था। दर ए सलाम का अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत ही साधारण लगा। ऐसा हवाई अड्डा तो हमारे पटना एयरपोर्ट का होगा। भूमध्य रेखा के करीब होने के कारण यहां गर्मी अधिक पड़ती है इसलिए हर तरफ स्त्री पुरुष काले रंग के की दिखे। यहां भी सुरक्षा अव्वल दर्जे की थी। बाहर निकलने की प्रक्रिया में हमे एक घंटे से अधिक समय लग सकता था अगर भारतीय उच्चायोग की तरफ से प्रतिनिधि न मिला होता। लगेज बेल्ट से अपना सामान लेकर के जैसे ही हम बाहर निकले तो स्वर्ण गंगा संस्था के तमाम सदस्य हमारा स्वागत करने के लिए फूलों के गुलदस्ते लेकर बाहर खड़े थे। देवेंद्र जी सबसे गर्मजोशी से मिले लेकिन अपने ब्रजवासी अंदाज में एक नोजवान जैसे ही आलिंगन बद्ध हुआ मैं समझ गया ये और कोई नहीं जलेसर वाला जितेंद्र भारद्वाज ही है। क्यो कि देवेंद्र जी के अलावा एक यही शख्स था जो पिछले एक महीने से हमारे संपर्क में था। सभी के स्वागत को स्वीकारते हुए हमने तंजानिया देश की ज़मीन पर अपने कदम रखे तो लगा ये तो बिल्कुल भारत जैसा ही है।



नींद पूरी न होने के कारण हम चारों के चेहरे का नूर गायब था लेकिन सबके आत्मीय व्यवहार ने हमे एक नई ताज़गी सी दे दी


जितेंद्र बोले गुरु आप हमारी गाड़ी में आओ..
मैं और वंदना यंत्रवत उसके साथ और प्रवीण तथा संजना देवेंद्र जी के साथ हो लिए। 45 मिनिट बाद हम लोग दर ए सलाम शहर में आगये। रास्ते भर जितेंद्र इस देश की सामान्य जानकारियां देते आये थोड़ी देर में हम लोग होटल में आगये। 

इस देश के समयानुसार शाम के 4 बज चुके थे।शानदार होटल था। कमरे भी बहुत बड़े बड़े और साफ सुथरे थे। बैड देखते ही सबसे पहले कमर सीधी की। तभी देवेंद्र जी का फोन आया कि आज शाम को साढे सात बजे हमारी संस्था के लोगों ने आपके स्वागत में परिचय सम्मेलन और रात्रि भोज का इंतज़ाम किया है। इसलिए आप लोग 7 बजे तैयार होजाये मैं लेने आऊँगा। थकन के कारण मन तो कर रहा था देवेंद्र जी के इस प्रस्ताव को ठुकरा दें लेकिन कुछ सोच कर मना नहीं कर पाए। हम लोगो ने एक घंटे विश्राम किया। पलक झपकते ही नींद आ गयी। चाय लेकर नहा कर फ्रेश हुए। ठीक 7 बजे देवेंद्र जी का फोन आ गया। विदेश में रह कर व्यक्ति पंक्चुअल बहुत हो जाता है। होना भी चाहिए जिसने समय का ध्यान नहीं रखा फिर समय उनका ध्यान नहीं रखता। हम चारो लोग उनके साथ गंतव्य के लिए रवाना हो गए। रास्ते भर शहर की मुख्य जगहों के बारे में बताते जा रहे थे देवेंद्र जी। स्कूल लेन, टेम्पल लेन इत्यादि इत्यादि।

20 मिनिट में हम लोग उस स्थान पर पहुच गए जहां हमारे सम्मान में भोज दिया जाना था।  मुख्य द्वार पर शिवि ने हमारा वेलकम किया। शिवि देवेंद्र जी के सुपुत्र हैं। अपनी बड़ी नोकरी छोड़कर अब अपने पिता के कारोबार को पूरी तरह संभाल लिया है, मज़े की बात ये कि जनाब कविता भी लिखते हैं। एक बड़ा सा हॉल। जिसमे लगभग 60 लोग । महिलाएं एक तरफ बैठीं थीं पुरुष एक तरफ। बच्चे दूर अपनी मस्ती में मस्त थे। एक स्टेज नुमा जगह जहां 6 कुर्सियां पड़ी थी। हमारे हाल में प्रवेश करते ही सब लोगों ने खड़े होकर, तालियां बजाकर हमारा स्वागत किया। हम चारो को उन कुर्सियों पर बैठा दिया गया। जितेंद्र आज के गेट टू गेदर का संचालन कर रहे थे। इस साधारण से युवा में संचालन की भरपूर क्षमताएं दिखाई दे रहीं थीं।

सरस्वती वंदना हुई। फिर सभी का हम लोगों से परिचय इस तरह कराया गया कि पुरुषके खड़े होते ही दूसरी तरफ से महिला खड़ी हो जाती थी जिससे आसानी से समझ मे आजाता था कि ये युगल पतिपत्नी हैं। परिचय में खूब हास परिहास हुआ। संस्था में अधिकतर लोग बिहार और झारखंड के थे कुछ परिवार उत्तर प्रदेश के थे। एक तरुण वशिष्ठ तो मेरे सिकंदराराऊ से 5 किलोमीटर दूर बिलार के निकल आये। मेरे यहाँ आने की सुनकर वह गत एक माह से रोमांचित  हो रहे थे। उनसे मिलकर घर जैसा फील हुआ।कुछ बच्चों ने कविताएं सुनाई। कुछ लोगों ने हमारे स्वागत में गीत सुनाये। फिर जितेंद्र ने बताया केंद्रीय हिंदी निदेशालय और भारतीय उच्चायोग के अधिकारी  भी आ गए है। उन्हें भी हमसे परिचय कराकर हमारे पास ही बिठाया गया। देवेंद्र जी ने अपने उद्बोधन में संस्था की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। अधिकारियों ने भी स्वागत वक्तव्य दिए। अंत मे प्रवीण और मुझे बोलने के लिए आमंत्रित किया। लोगो के आग्रह पर एक एक कविता भी सुनानी पड़ी। 


कार्य क्रम समाप्त होने को ही था कि एक कोने से 10-15 छोटे छोटे बच्चे  एक लाइन से रंग बिरंगी टोपियां पहने, मुंह से किसी वाद्य यंत्र को  बजाते हुए चले आरहे थे। उनके पीछे जितेंद्र माइक पर गाते हुए आगे बढ़ रहे थे - "तुम जिओ हज़ारो साल साल के दिन हों पचास हज़ार...." उसके पीछे-पीछे शिवि एक मेज पर केक सजा कर ला रहे थे। सारे बच्चो ने एक साथ मेरे सामने घेरा बना लिया और बाजा बजा कर मुझे मेरे जन्म दिन का सरप्राइज दिया। सभी लोगो  ने एक साथ हैप्पी बर्थ डे बोलकर, तालियां बजाकर मुझे शुभकामनाएं दीं। 





मैंने सभी को हृदय से आभार व्यक्त किया और स्वर्ण गंगा संस्था का यह अनुपम उपहार देने के लिए देवेंद्र जी को धन्यवाद ज्ञापित किया। प्रसन्नता पूर्वक हम चारों ने मिलकर केक काटा। उम्र में सबसे बड़े होने के नाते उन्हें सबसे पहले केक खिलाकर आशीर्वाद लिया। फिर हम सभी ने एक दूसरे को केक खिलाया। खाना खाकर हम लोग होटल आगये। इस शाम ने हमारी सारी थकान उड़न छू कर दी। 11 बज चुके थे। बच्चों से फोन पर बात करके परस्पर कुशलक्षेम पूछ कर गुड नाईट कर ली।