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अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-2


13 जनवरी 2018
विश्व हिंदी दिवस पर कविसम्मेलन

खिड़की के परदों से सूरज की चमक झांक कर पलकों पर पड़ी तो बहुत असहज सी लगी, इग्नोर करके फिर सो गया। लेकिन जैसे ही गौरैया की चहचाहट के स्वर कानों में पड़े तो आँखो की नींद ने भी बगावत कर दी। आंखे मसलते हुए घड़ी की तरफ देखा तो साढे आठ बजे चुके थे। बिस्तर से उठा खिड़की से झांक कर देखा पड़ोसी मुंडेर पर 10-12 चिड़ियां फुदक फुदक कर चहचहा रही हैं। मन प्रफुल्लित हो गया। जल्दी से वंदना को जगाया और फुदकती हुई चिड़ियां दिखाईं। हमारे यहां इन चिड़ियों की नस्ल ही खत्म हो गयी है । पिछले 20 सालों से ये आंगन में दिखना बंद होगयी हैं। खैरः मैंने 2 कप चाय बनाई। एक साथ तंजानिया की भोर का आनंद लिया। फोन करके प्रवीण को जगाया। हम लोग फ्रेश होकर 10 बजे डाइनिंग हाल में नाश्ता करने आगये। थोड़ी देर बाद जितेंद्र और पाठक जी भी आगये। सभी लोगों ने साथ मे नाश्ता किया।

हमारा आज का शेड्यूल था। 2 बजे तक साइट सीन भ्रमण, खरीद दारी, लंच, और शाम के मुख्य कार्यक्रम की तैयारी करना।
नाश्ता करने के बाद 2 गाड़ियों में सभी बैठकर चल दिये तंजानिया के इस सुंदर शहर का भ्रमण करने। आधा घंटे की ड्राइव के बाद हम पहुँच गए "स्लिप वे" । ये इतनी बड़ी जगह है जहां चार पांच घंटे आराम से बिताए जा सकते हैं। यहां 5 स्टार होटल, समंदर का किनारा, संग्रहालय, मॉल, रेस्टोरेंट, और छोटी मोटी दुकानें सब एक ही जगह हैं। पाठक जी बारी बारी से हमे सब दिखाते जा रहे थे सबसे पहले भुतहा पेड़ देखा।



ऐसा बताया जाता है कि रात में इस पेड़ को देख कर डर लगता है। रामसे ब्रदर्स की फिल्मों में इन्ही पेड़ों पर भूत रहा करते थे।
अंदर कुछ दूर जाने पर समुद्र के दर्शन होगये। बहुत सुंदर बीच। अनेकों वोट्स और स्टीमर खड़े थे सागर में। बहुत सुंदर नज़ारा था। हमने भी एक वोट किराए पर ली और एक घंटे तक समंदर की लहरों  घूम घूम कर आनंद लिया। जितेंद्र हम सबको लाइव कर रहे थे। यूपी अंदाज में हमारे इंटर व्यू भी लेते जा रहे थे।




धूप बहुत तेज़ थी पसीने आ रहे थे, वर्ना इस जगह काफी देर ठहरा जा सकता था। कुछ फोटोग्राफी करके हम लोग रेस्तरां में आगये सबने अपनी अपनी पसंद के जूस लिए और फिर से तरोताज़ा हो गए। यहां के फलों में उनका वास्तविक स्वाद देखने को मिलता है। क्यो कि खेती में कोई जैविक खाद का प्रयोग ही नही होता।

वंदना और संजना दोनों ही इस ट्रिप का पूरा आनंद ले रही थी। हर मूवमेंट और हर लोकेशन पर इन दोनों के फोटो लेने के लिए हम दोनों को व्यस्त रहना पड़ता था। 

प्रवीण और संजना संग्रहालय में चले गए। मैं और वंदना जितेंद्र के साथ खरीद दारी करने के लिए दुकानों की तरफ चले गए। हम लोग सिर्फ पसंद कर रहे थे उनसे बात करने का, कीमत पूछने का और उसे कम में लेने का सारा जिम्मा जितेंद्र ने उठा रखा था। बच्चों के लिए कुछ कपड़े और गिफ्ट लेते लेते 1 बज गया। पाठक जी ने चेताया जल्दी करिये अभी उच्चायोग की तैयारी देखने भी जाना है और आप लोगो को लंच भी करना है। हम लोगों ने कीमत चुकाई। इतनी देर में प्रवीण भी आगये। हम लोग उच्चायोग होते हुए शहर में आगये। हमने इच्छा जाहिर की आज हम गुजराती थाली खाएंगे। पाठक जी अपने एक मित्र के गुजराती रेस्टोरेंट में ले गए। स्वादु भोजन के पश्चात हम लोग होटल में विश्राम करने के लिए आगये। कुछ थकान, कुछ भोजन का नशा दोनों की वजह से तुरंत नींद आगयी।



शाम के 6 बजे तक हम लोग सोये। फिर से स्नान किया और तरोताज़ा होकर 7 बजे तक तैयार होकर नीचे आगये। संस्था के कुछ प्रमुख कार्यकर्ता हमे लेने आगये। चाय पीकर हम लोग कार्यक्रम हेतु भारतीय उच्चायोग के प्रांगण के लिए रवाना हो गये। भारतीयों की लेट लतीफी यहां भी दिखाई दे रही यही। 7 बजे का वक्त दिया गया था। साढे सात बजे  तक भी लोग आरहे थे। आज भी कार्यक्रम का संचालन जितेंद्र के हाथ मे था। रोज का नटखट जितेंद्र आज सिल्क के कुर्ते पाजामे में बहुत संजीदा नज़र आरहा था। बहुत ही गंभीरता से संचालन कर रहा था।


धीरे धीरे सभी कुर्सियां भरती जा रहीं थीं।  प्रतीक्षा थी तो बस मुख्य अतिथि उच्चायुक्त संदीप आर्य के आने की। ठीक 8 बजे संदीप जी  पत्नी सहित पधार गए। सभी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। हम लोगों से परिचय कराया गया। देवेंद्र जी की मेहनत को प्रणाम करना होगा कि परदेश में इतने लोगो से संपर्क रखकर इन्हें इकट्ठा कर लेना कोई आसान बात नही है। 400 कुर्सियां पूरी भर चुकीं थीं। दीप प्रज्वलन के लिए मंच से घोषणा की गयी। संदीप जी, स्वर्ण गंगा के अध्यक्ष श्री देवेंद्र पाठक और हमने मिलकर माँ सरस्वती के आगे दीप प्रज्वलन की रस्म अदा करके उन्हें माल्यार्पण किया। 

प्रथम वक्तव्य संदीप जी का हुआ जिसमें उन्होंने इस संस्था की बहुत तारीफ की और भारत के द्वारा किये गए प्रयासों और सहयोग के बारे में बताया।


संस्था के अध्यक्ष श्री देवेंद्र पाठक जी ने संस्था की गतिविधियां बतायीं।इसके बाद शुरू हुए कुछ मनोरंजक कार्यक्रम जो तंजानिया के बच्चों के द्वारा प्रस्तुत होने थे। लगभग 30 अफ्रीकी बच्चे मंच पर एक साथ आये। अलग अलग वेश भूषा में । इनमे से एक अफ्रीकी इमरान नाम के युवा ने हिंदी में बोलकर चमकृत कर दिया। 

उसने अपने 10 मिनिट के भाषण में हम दोनों के बारे में, भारत की संस्कृति के बारे में, तथा दोनों देशों के संबंन्धो के बारे में लड़खड़ाती हिंदी में शानदार बोला। मुझसे न रुका गया मैंने उस बच्चे के लिए खड़े होकर तालियां बजायीं। पूरा पंडाल तालियों से गूंज गया। फिर एक अफ्रीकी नृत्य किया गया। एक हिंदुस्तानी नृत्य तथा भारत को और हिंदी को समर्पित एक समूह गीत प्रस्तुत किया गया। इसके बाद इन सभी बच्चों को समर्पण भाव से हिंदी पढ़ाने वाली और गीत इत्यादि सिखाने वाली सविता मौर्य जी को सम्मानित किया गया। सविता जी पिछले कई वर्षों से न धूप देखतीं हैं न बारिश लगातार अपने 2 छोटे छोटे बच्चों की परवरिश के साथ साथ इन तंज़ानियांन बच्चो को पढ़ा रहीं हैं। सम्मान लेते वक्त मैंने उनके छलछलाते हुए आंसुओं को पढ़ा था। उनमें आभार का भाव भरा था। मेरा मानना है ऐसे लोगों को भारत मे सरकार की तरफ से सम्मानित किया जाना चाहिए।





तत्पश्चात दो स्थानीय कवियों ने कविता पाठ किया। फिर एक एक करके हमारा परिचय देते हुए मंच पर बुलाया गया संदीप जी और देवेंद्र पाठक जी द्वारा हमें सम्मानित किया गया। हम दोनों को  विश्व हिंदी सम्मान से नवाज़ा गया। साथ ही संजना और वंदना को भी बुलाकर संदीप जी की पत्नी से सम्मान कराया गया। हम दोनों की पत्नियां बहुत खुश थी। क्यों कि उनके जीवन मे विदेश की धरती पर इस प्रकार सम्मान प्रथम बार प्राप्त हो रहा था।






इसके बाद जितेंद्र कवि सम्मेलन का माइक प्रवीण को सौंप कर नीचे श्रोताओं में हमे दाद देने के लिए चले गए। जितेंद्र हम लोगों को अनेकों बार भारत मे सुन चुके हैं कहाँ दाद देनी है वो भली भांति जानते हैं। हमारे पास 90 मिनिट थीं। 45 मिनिट की पहली पारी प्रवीण ने खेली, खूब चौके छक्के लगाए, खूब हंसाया और अन्त में भीष्म प्रतिज्ञा सुनाकर गेंद पैवेलियन से बाहर कर दी। लेकिन अगली गेंद पर केवल एक रन लेकर बेटिंग मुझे थमा दी। अगली और अंतिम 45 मिनिट की पारी खेलने के मैं बिल्कुल तैयार था। मेरे लिए बॉल अधिक थी टारगेट कम था। इसलिए धीरे धीरे मुक्तकों के द्वारा एक एक स्ट्रोक पर चार चार रन बनाए। जनता को बहुत मज़ा आरहा था। मैं राहुल द्रविड़ की तरह खेल रहा था। अधिकतर मुझे tv के माध्यम से बहुत देख चुके थे लाइव सुनते हुए बहुत आल्हादित थे। अंत मे अपने दो गीत सुनाकर विजयी स्ट्रोक खेलते हुए शान से हाथ हिलाते हुए स्ट्रमप्स उखाड़ कर ले आये। सभी लोगों ने खड़े होकर हमारा अभिवादन किया।







जितेंद्र ने सभी का आभार प्रकट करने के लिए संस्था के सचिव पुण्डरीक सिन्हा जी को बुलाया। सब लोग बहुत खुश थे। कह रहे थे ऐसा अभी तक नहीं हुआ, लोग अंत तक बैठे रहे और समय का पता ही नही चला कि कब गुज़र गया। ये हमारे लिए उपलब्धि थी। बहरहाल हम लोग सबकी बधाइयां लेने लगे। सेल्फियां ली जाने लगीं। सुबह नाश्ते पर आमंत्रित किया जाने लगा। जैसा कि अक्सर होता है सफल प्रोग्राम के बाद....

इतने अच्छे श्रोताओं के बीच से उर्जित होकर सभी से विदा लेकर हम लोग पाठक जी के साथ अपने होटल के डाइनिंग हॉल में आ गए। खाने का ऑर्डर दिया। पाठक जी प्रोग्राम की सफलता से गदगद थे। खाना खाते खाते हमने पाठक जी की ज़िंदगी के पन्ने पलटने चाहे। पाठक जी भावुक हो गए और धीरे धीरे भारत से तंजानिया आने की और यहां संघर्ष की गाथा उन्होंने जिस तरह हमे सुनाई तो लगा इस प्रेरक व्यक्ति पर तो फ़िल्म बनाई जा सकती है। आज पाठक जी की कहानी सुन कर हम बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बताया अगर राजीव कुमार जी हमे न मिलते तो हम इस देश मे सरवाइव नहीं कर पाते। आज पाठक जी दर ए सलाम के जाने माने उद्योगपति हैं। 
12 बज चुके थे, हम लोग उनसे विदा लेकर अपने अपने कक्ष में सोने चले गए।


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