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अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-4

15 जनवरी 2018


आज हमारा विदाई का दिन था। कुछ सामान रात को ही पैक कर लिया था शेष सुबह उठकर जल्दी जल्दी समान जमाया। कल की ट्रिप से कोई संतुष्ट नहीं लग रहा था। न ही जितेंद्र, न ही शिवि और न ही स्वयं पाठक जी। आज सोमवार था, काम का दिन, आज बॉस आने वाले है इसलिए जितेंद्र ने कल ही हमसे विदा ले ली थी।  बहुत भावुक थे जब वो हमसे जुदा हुए । इन तीन दिनों में जितेंद्र ने हम लोगो का साथ एक पल को भी नहीं छोड़ा। खूब सहयोगी भूमिका में रहे, संस्था के लिए भी और हमारे लिए भी।


आज साढे नो बजे हम लोग नाश्ता करके अपना सामान लेकर नीचे आगये। यूँ हमारी फ्लाइट शाम को 5 बजे थी लेकिन पाठक जी शायद कल की कमी पूरी करना चाहते थे। दोनों गाड़ियों में जैसे ही समान रखना शुरू किया तभी तरुण वशिष्ठ जी होटल में आगये। और घर चलने का आग्रह करने लगे। उन्होंने बताया उनका बेटा बीमार है और वो हम लोगों से मिलना चाहता है। मैं खुद को रोक नहीं सका ये सुनकर। प्रवीण और पाठक जी की सहमति ली और सभी लोग चल दिये उनके आवास पर। रास्ते मे हम टेम्पल स्ट्रीट से गुजरे। तंजानिया देश मे इस मार्ग पर मंदिर, मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा सभी हैं। आर्य समाज का बहुत बड़ा स्थान है। हम लोग एक भव्य मंदिर में प्रवेश हुए बहुत बड़े क्षेत्रफल में यह बना हुआ है। यहां राम, कृष्ण, शिव, गणेश, तिरुपति, जगन्नाथ आदि के मंदिर हैं। सभी की बहुत भव्य प्रतिमाएं हैं। क्रमशः सभी का आशीर्वाद लेकर हम लोग तरुण जी के आवास पर गए उनके बेटे को देखने। जैसे ही उसे मालूम हुआ हम लोग उससे मिलने आने वाले हैं। अपने बिस्तर से उठ बैठा  और हमारे साथ फोटो लेने के dslr केमरा तैयार कर लिया। 10 मिनिट उनके घर बैठे , शर्बत पिया और आगे के लिए चल दिये।


हमारे थोड़ी देर के लिए ही आने से उनके परिवार के चेहरे पर रौनक आगयी। शिवि हमारा समान लेकर अपने प्रतिष्ठान जा चुके थे। अब हम लोग और पाठक जी ही रह गए। हमने पूछा कि अब हम लोग कहाँ जा रहे हैं। तो पाठक जी ने रहस्य खोला कि कल आप को हम ठीक से घुमा नहीं पाए थे इसलिए आज हम आपको यहां के सबसे खूबसूरत रिसोर्ट  और सबसे खूबसूरत बीच पर ले जा रहे हैं। आज आप के पास 3 घंटे है खूब सागर की लहरों के आनंद लीजिये यहां के समंदर से आपको भय नहीं लगेगा। यहीं हम लोग लंच लेकर आगे बढ़ेंगे।
25 मिनिट की ड्राइव के बाद हम लोग उस खूबसूरत जगह आगये जिसका जिक्र अभी किया गया।







वास्तव में बहुत सुंदर रिसोर्ट था। बहुत सुंदर जगह। किसी गुजराती का था शायद। हम लोगों ने अपने नहाने के कपड़े पहने और चल दिये बीच की तरफ। सचमुच बहुत लुभावना बीच था। आज आश्चर्य की बात ये की 70 वर्षीय देवेंद्र पाठक जी भी तैरने की मुद्रा में आ गये थे। उन्हें देख कर मुझ जैसे न तैरने वाले को भी हौसला मिला। समंदर में जाने से पहले नारियल वाला दिखाई दे गया। सबसे पहले एक एक नारियल पानी पिया, गला तर किया। 





फिर पांचों लोग समंदर में प्रवेश करने लगे। ये किनारा बहुत गहरा नहीं था इसलिए देवेंद्र जी तो बहुत अंदर तक चले गए उनके उकसाने पर प्रवीण भी उनके साथ चले गए लेकिन हम तीन डरपोक घुटने तक पानी मे ही जाकर नहा लिए। बहुत मज़ा आया। बहुत देर जल क्रीड़ा की।

 





फिर स्विमिंग पूल में फ्रेश पानी से नहाने के बाद कुछ तारो ताज़ा हुए। आज लग रहा था तंजानिया में आकर कुछ विशेष आनंद आ रहा है। संजना अक्सर बच्ची की तरह व्यवहार करती थी जब भी अलग अलग पोज बनाकर फोटो खिचाती थी तो बहुत भली लगती थी।








अगर एक बात सच कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी। अगर संजना और वंदना हम लोगों के साथ न होतीं तो शायद हम इतना सब कुछ घूम भी न पाते। इन लोगों के घुमाने के चक्कर मे हम लोगों ने तंजानिया की आबो हवा देख ली। हम लोग विदेश इतना घूम चुके हैं कि अब कोई नई चीज देखने के प्रति कोई उत्सुकता नहीं है। इसलिए हम इन दोनों नारियों के बहुत आभारी हैं। जिन्होंने हमे तंजानिया घुमा दिया।

समय खिसकता जा रहा था। लंच का ऑर्डर नहाने से पहले जी दे दिया था। नहाने के तुरंत बाद तेज भूख लग रही थी। लंच भी तैयार था। भरपेट भोजन कर हम लोग देवेंद्र जी के प्रतिष्ठान पहुंच गए। यहाँ पैनल बनाये जाते है। जो कई देशों में भेजे जाते हैं। बहुत बड़ा कारोबार है इनका। सोलर पैनल से खुद की बनाई बिजली से ही काम करते हैं। ये पूरा व्यवसाय शिवि देखते हैं। पाठक जी का तो सिर्फ सुपरविजन है। शिवि बहुत समझदार, योग्य और सहृदय युवा हैं। कविता की कद्र करना जानते हैं प्रभु ऐसा एक एक पुत्र सबके घर मे दे।

अब हमारे एयर पोर्ट जाने का वक्त हो आया था। दो गाड़ियों और हम, हमारा सामान लेकर एयरपोर्ट के लिए रवाना होगये। थोड़ी देर में ही एयरपोर्ट आगये। मन तो नहीं कर रहा तो कोई किसी को छोड़े। लेकिन हम स्थायी निवासी नहीं थे वहां के इसलिये भारत तो आना ही था। इन चार दिनों में देवेंद्र जी ने हमे पिता या अभिभावक जैसा स्नेह दिया, और शिवि ने एक दोस्त की भूमिका निभाई। कुल मिलाकर सब कुछ अविस्मरणीय रहा। सबने गले लगकर चरण स्पर्श कर हमें विदा किया। और तब तक एयरपोर्ट पर रहे जब तक हम बोर्डिंग गेट पर नहीं पहुँच गए।

इसी बीच एक दुर्घटना हो गयी। एयरपोर्ट के अंदर घुसते ही सामान की जांच के साथ साथ व्यक्ति की जांच भी होती है यहां कुछ अधिक ही सतर्कता वरत रहे थे जैसी दुबई में थी। महिलाओं के मेटल की हर चीज उतरवा ली गयी। हम लोगों के पर्स, बेल्ट मोबाइल, घड़ी। आदि सब। भीड़ बहुत थी इसलिए जल्दी जल्दी सामान समेटा। प्रवीण को एक बैग से दूसरे बेग में सामान शिफ्ट करना था। जिसे लगेज में देना था। ये प्रक्रिया पूरी की बोर्डिंग पास लिया और सुरक्षा जांच के लिए फिर वही प्रक्रिया। एक पल को तो झुंझलाहट होने लगी। खैर ये एक प्रक्रिया है सभी को गुजरना पड़ता है इससे। हम लोग अपने समय से लगभग एक घंटे पहले बोर्डिंग गेट पर पहुच गए। हिंदुस्तानी व्यक्ति को जैसे ही समय मिलता है मोबाइल से खेलने लगता है। मैं और वंदना अपनी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल के फोटो चेक करने लगे। हमे देख कर प्रवीण को सूझा मैं भी देख लूँ। लेकिन देखा तो मालूम हुआ कि मोबाइल है ही नहीं। बेग की सभी जेब तलाशीं, कहीं नहीं। संजना का बैग देखा, उसमें भी नहीं मिला तो प्रवीण के चेहरे पर चिंता झलकने लगी। मैने पूछा तो उसने कारण बताया। मैंने ढांढस बंधाया, हो सकता है बैग में सामान शिफ्ट करते वक्त जल्दी में उधर चला गया हो। लेकिन उसे शक था ये पहली सुरक्षा जांच में वहीं रह गया। अब नियमानुसार वापस लौट नहीं सकते थे लेकिन हम लोगों ने अधिकारियों से परमिशन ले ली। और हम दोनों अंतिम सुरक्षा पॉइंट पर पहुच गए। अपनी बात रखी तो अधिकारी ने ध्यान से सुनी। पहले हम सब के चारों बेग का एक्स रे किए। जब नही ट्रेस हुआ। तो हमने निवेदन किया कि पहले वाले पॉइंट पर हमें चेक कर लेने दें तो उन्होंने मना कर दिया, अपने अधिकारी को भेजा और चेक करवाया। लेकिन वहां भी कोई लावारिस मोबाइल नहीं मिला। अब चिंता बढ़ने लगी। अधिकारियों ने इतना सहयोग किया कि सीसीटीवी कैमरे तक से चैक करा लिया लेकिन कोई सूत्र नहीं मिला। निराश होकर हम लोग वापस आगये। प्रवीण बहुत परेशान थे। होते भी क्यों न। कविता के अलावा उनका कारोबार बड़ा है। अनगिनत कॉन्टेक्ट, लोगों का लेन देन, कविताएं आदि सब कुछ था उस मोबाइल में।

मैंने बहुत सांत्वना दी और भरोसा दिया कि भारत मे जब सामान खोलोगे तो ज़रूर मिल जाएगा। ख़ैर फ्लाइट का समय हो गया । इस अंतिम प्रकरण से बोझिल मन लिए हम जहाज में बैठ गए। 5 घंटे की यात्रा थी दुबई तक की।  भोजन किया, फिल्में देखीं थोडा सोये। फिर आगया दुबई। वही खूबसूरत दुबई एयरपोर्ट।










भारत के समयानुसार रात के 2 बजे थे इसलिये आंखों में नींद भरी हुई थी। यहां से 4 बजे उड़ना था। एयरपोर्ट घूमते घूमते कब 2 घंटे कट गये पता ही नहीं पड़ा। अगली फ्लाइट का समय हो गया। हम लोग फिर से उसी जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद जहाज में आकर बैठ गए। इस बार तो बैठते ही नींद आगयी और हम लोगों की आंख तब खुली जब जहाज टर्मिनल 3 पर लेंड हुआ। जहाज से उतर कर बेल्ट से सामान लिया। प्रवीण ने सबसे पहले अपना सामान इस उम्मीद से चेक किया शायद मोबाइल मिल जाये  लेकिन दुर्भाग्य कि उम्मीद टूट गयी, मोबाइल नहीं मिला। अब तो सब्र के अलावा कोई चारा नहीं था। इन चार पांच दिनों की सभी स्मृतियां समेटे हम सबने एक दूसरे से गले लग कर अपने अपने गंतव्य के लिए विदा ली। 

लेकिन चलते वक्त हमने जब संजना से पूछा कि कैसी लगी तुमको ये विदेश यात्रा। तो मुस्कुराकर वंदना की तरफ मुंह करके बोली- इन्होंने (प्रवीण की ओर इशारा करते हुए) ने करा दी तो कर ली वर्ना हम तो घर बैठे ही थे, क्यो भाभी जी? उसके यह कहते ही हम सब लोग खिलखिला कर हंस पड़े क्यो की संजना का यह वाक्य पूरी यात्रा में हमे आनंद देता रहा था।
 

2 comments:

Manjull Manzar Lucknowi said...

Bahut sundar sansmaran.

praveen shukla said...

भाई कमाल ही लिखा है। कुछ भी नहीं छोड़ा। हार्दिक बधाई।