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गीत- वो बदले तो मजबूरी है.....

तन और मन है पास बहुत फिर,
सोच-सोच में क्यों दूरी है?
हम बदले तो कहा बेवफा, वे बदले तो मजबूरी है।

गंगा के तट बैठ रेत के,बना-बना के महल गिराये।
उसने हमको, हमने उसको जाने कितने सपन दिखाए।
झूठ-मूठ को मांग भरी थी, हाथ अभी तक सिन्दूरी है। हम .......

उपवन-उपवन घूमे फिर भी
मन की कली नही खिल पायी।
जग को सुरभित करदे अब तक ऐसी गंध नही मिल पायी।
अब भी मन मृग बना हुआ है - फिरे ढूंढता कस्तूरी है। हम....

अब लगता है जाग-जाग कर
सपनो के क्यों बोझ उठाये?
मुस्कानों को बेच बेचकर
आंसू अपने घर ले आये।
प्रेम तो अब व्यापार बन गया- तड़पन उसकी मज़दूरी है। हम....
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गीत

बेबसी के तम घनेरे कब तलक हमको छलेंगे?
ये अन्धेरे तब छटेंगे दीप बन जब हम जलेंगे।

चाहता है हर कोई हमको फँसाना जाल में,
कुछ न कुछ लगता है काला ज़िंदगी की दाल में,
हर तरफ फन को उठाये नाग भी फुफकारते,
भूलकर अपना पराया दंश केवल मारते,
मोम हैं हम, किंतु इन साँचों में आख़िर क्यों ढलेंगे?.......

आज हमको ही डराती हैं निजी
परछाइयाँ,
चैन से रहने हमें देती कहाँ तन्हाईयाँ,
खत्म होता जा रहा,
हर आँख से पानी यहाँ,अब यहाँ तक आगये हैं और जाएंगे कहाँ,
सामने मंज़िल नहीं तो और अब कैसे चलेंगे?......

मत समझिए लघु किसी को इस वृहद संसार में,
एक दीपक ही बहुत है इस घने अंधियार में,
हर कोई जकड़ा हुआ है नफरतों के तार से,
क्यों नहीं बन्धन सभी सब काटते है प्यार से,
यत्न सच्चे हों अगर, मिलकर सभी फूले फलेंगे।.....
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गीत-अपनाना हो तो अपनालो...

मेरे अंदर खोट बहुत है
अपनाना हो तो अपनालो,
दिल का मंदिर सूना सूना
आ जाओ एक दीप जला लो।

सच कहता हूँ जीवन भर मैं
सुर लय ताल समझ ना पाया,
जितना जैसा समझ सका हूँ
वैसा ही इस कंठ से गाया,
गीत और सुन्दर हो जाये
मेरे सुर से साज मिला लो।....

मेरी थकन देख कर मंज़िल
खुद चलकर के पास आगयी
भरी दुपहरी में भी ठंडक
यही धूप की अदा भा गयी
पथरीली है डगर तुम्हारी
गिर ना जाऊँ मुझे सम्हालो।....

कोई कहे मुझको आवारा
कोई कहे मुझको मनमौजी
पर नादान रहा जीवन भर
घूम घूम कस्तूरी खोजी,
फिर इस जग में खो ना जाऊँ
अपने अंदर मुझे छुपालो।.....