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सब कान्हा की बांसुरियां हैं....

कैसे आएं खुली सड़क पर
तंग बहुत ब्रज की गलियां हैं।
जोग सिखाये कैसे ऊधौ
सब कान्हा की बांसुरियां हैं।

तम ही तम पसरा है चारों
ओर ये कैसी पूनम आयी,
अंतर्तम हो गया प्रकाशित
मावस ने जब लोरी गायी,
ये कैसा पंचांग है जिसमे
उलटी पलटी सब तिथियां हैं। जोग.....

बाहर भीतर उमस बहुत है
क्या होगा खिड़की खुलने से,
ना ये गंध सुगंध बनेगी
एक अगरबत्ती जलने से,
कैसे खिलकर महक बिखेरें
उत्सुक सी सारी कलियां हैं। जोग......

सब कुछ विधि विधान है जग में
कुछ भी अपने हाथ नहीं है,
जिसको हम अपना समझे हैं
वो भी अपने साथ नहीं है,
कुछ भी इधर उधर ना होता
सब निर्धारित गतिविधियाँ हैं। जोग....

पहले तो थक कर अपने प्रिय
की बाहों में सो लेते थे,
जब जब मन भारी होता था
लिपट लिपट के रो लेते थे,
ना अब आँसू ना ही सपने
सूखी सूखी सी अँखियाँ हैं। जोग.....
#vishnusaxena

एक गीत टूटन का.....

जिसको जीवन भर समझा था सपनों का इक घर
खुली आँख तो पाया- टूटा फूटा सा खंडहर।

घर के बिल्कुल पास समंदर
खूब गरजता था,
पर देहरी छूने का साहस
कभी न करता था,
ऊंची ऊंची लहरें फिर भी, नीची रही नज़र।
आंख.........

हर मुंडेर पर हमने गमले
रखे करीने से,
फूल खिलेंगे यही प्रतीक्षा
कई महीने से,
धूप- हवा-पानी सब कुछ था मिला मगर पतझर।
आंख...........

सोचा था एक प्यारी सी
अब ग़ज़ल कहेंगे हम,
पर मतला कहने भर में ही
टूटे सभी वहम,
जितने शेर हुए सबकी ही बिगड़ी हुई बहर।
आंख...........

कड़ी धूप में भाग भाग कर
रातें काली कीं,
तब जाकर के इस गुलशन को
कुछ हरियाली दीं,
हल्की सी आंधी ने सब कर डाला तितर-बितर।
आंख.......
#vishnusaxena

नववर्ष की आशा का गीत

गुनगुनाकर कह रहीं हमसे हवाएं
आओ मेरे साथ सपनों को सजायें

वर्ष भर जो शूल से चुभते रहे हैं
आओ उनको फूल का उपहार दे दें,
जिस कली ने ज़िन्दगी को खुशबुएँ दीं
हम सुगंधि का उसे आभार दे दें,
क्यों न उसके फूल गमलों में लगाएं
आओ मेरे साथ सपनों को सजायें।...

जिस नदी के जल को उसने छू लिया है
वो मुझे गंगा सी पावन लग रही है,
मेरे आँचल में सभी त्यौहार होंगे
एक आशा की किरण भी जग रही है,
हाथ में ले हाथ सारे ग़म भुलाएं।
आओ मेरे साथ सपनों को सजायें....

नित शिखर छू लें नए आयाम के हम
दूर होने की न सोचें पर धरा से,
जिसने हमको कर दिया इतना बड़ा है
आज भी उनके लिए हों हम ज़रा से,
सोच के अपने फलक को हम बढ़ाएं
आओ मेरे साथ सपनों को सजायें...