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गीत

बेबसी के तम घनेरे कब तलक हमको छलेंगे?
ये अन्धेरे तब छटेंगे दीप बन जब हम जलेंगे।

चाहता है हर कोई हमको फँसाना जाल में,
कुछ न कुछ लगता है काला ज़िंदगी की दाल में,
हर तरफ फन को उठाये नाग भी फुफकारते,
भूलकर अपना पराया दंश केवल मारते,
मोम हैं हम, किंतु इन साँचों में आख़िर क्यों ढलेंगे?.......

आज हमको ही डराती हैं निजी
परछाइयाँ,
चैन से रहने हमें देती कहाँ तन्हाईयाँ,
खत्म होता जा रहा,
हर आँख से पानी यहाँ,अब यहाँ तक आगये हैं और जाएंगे कहाँ,
सामने मंज़िल नहीं तो और अब कैसे चलेंगे?......

मत समझिए लघु किसी को इस वृहद संसार में,
एक दीपक ही बहुत है इस घने अंधियार में,
हर कोई जकड़ा हुआ है नफरतों के तार से,
क्यों नहीं बन्धन सभी सब काटते है प्यार से,
यत्न सच्चे हों अगर, मिलकर सभी फूले फलेंगे।.....
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गीत-अपनाना हो तो अपनालो...

मेरे अंदर खोट बहुत है
अपनाना हो तो अपनालो,
दिल का मंदिर सूना सूना
आ जाओ एक दीप जला लो।

सच कहता हूँ जीवन भर मैं
सुर लय ताल समझ ना पाया,
जितना जैसा समझ सका हूँ
वैसा ही इस कंठ से गाया,
गीत और सुन्दर हो जाये
मेरे सुर से साज मिला लो।....

मेरी थकन देख कर मंज़िल
खुद चलकर के पास आगयी
भरी दुपहरी में भी ठंडक
यही धूप की अदा भा गयी
पथरीली है डगर तुम्हारी
गिर ना जाऊँ मुझे सम्हालो।....

कोई कहे मुझको आवारा
कोई कहे मुझको मनमौजी
पर नादान रहा जीवन भर
घूम घूम कस्तूरी खोजी,
फिर इस जग में खो ना जाऊँ
अपने अंदर मुझे छुपालो।.....

रंगों का गीत

रंग बिरंगे इस जीवन में
कुछ रंग फीके-कुछ रंग गहरे।
कुछ रंग आवारा बादल से
कुछ रंगों पर बैठे पहरे।

बचपन में भोलेपन का रंग
यौवन में जोशीले रंग थे,
प्रौढ़ हुए बेबस रंग छलके
रंग बुढ़ापे में बेढंग थे,
कुछ रंगों ने आँखे खोलीं
कुछ रंगों से हो गए बहरे।
कुछ रंग आवारा बादल से
कुछ रंगों पर बैठे पहरे।

किस्मत ने मेरे आँगन में
रंग-रंग के रंग दिखाये,
कुछ रंगों ने आँख तरेरी
कुछ रंगों ने अंग सजाए,
कुछ रंगों ने जल्दी कर दी
कुछ रंग अंत समय तक ठहरे।
कुछ रंग आवारा बादल से
कुछ रंगों पर बैठे पहरे।

कर्म भूमि की इस दुनियाँ में
श्रम तो सबको करना होगा,
प्रभु तो सिर्फ लकीरें देता
रंग हमें ही भरना होगा,
जीवन के रूठे पन्नों में
भरने होंगे रंग सुनहरे।
कुछ रंग आवारा बादल से
कुछ रंगों पर बैठे पहरे।