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अमेरिका के संस्मरण--2011.....(जब परदेसी विश्वविद्यालय में अपना हिन्दी विभाग दिखा.....)

नार्थ केरोलाइना-

मिडलेंड से प्रोग्राम करने के बाद हम तीनो हवाई जहाज सेIHA की एक स्तम्भ राले धरम में श्रीमती सुधा ओम धींगरा के निवास पर पहुँच गये। यहाँ हमको 4 दिन रुकना था। यहाँ की मेहमान नवाज़ी के सभी कवि कायल हैं। खाने से लेकर सोने तक की सारी सुविधाओं का बड़ी बारीकी से ध्यान रखा जाता है यहाँ । बहुत बड़ा घर, बहुत सुन्दर साहित्यिक माहोल और बहुत बुद्धिमान और सीधे-सादे से सुधा जी के हमसफर पति श्री ओम जी। बहुत मन लगता है सभी भारत से गये हुये कवियों का, इस घर में।

सुधा जी अपने प्रोग्राम को सफल बनाने के लिये अपनी मज़बूत टीम के साथ मन प्राण से लगती हैं, इसलिये अपने मक़सद मे सफल हो जाती हैं। हर बार की तरह इस बार भी कवि सम्मेलन सुपर हिट हुआ। सफलता के मद में खूब छक कर भोजन किया और खूब सोये। अगले दिन घर में ही बने खूबसूरत थियेटर में पडोसन देखी। हर गाने पर हम तीनों ने खूब नृत्य किया। अगले दिन सुधा जी से हमने आग्रह किया कि हम लोग अमेरिका की सबसे प्राचीन यूनिवर्सिटी घूमना चाहते हैं। उन्होंने वहाँ के प्रोफेसर अफरोज़ ताज़ और जान काल्वेल्ट से कह कर सब तय कर के हमें खुद वहाँ लेकर गयीं। आज उनका एक लेक्चर था उन्हीं की किसी कविता पर। हमे अफरोज़ के हाथों सोंप कर वो क्लास में चली गयीं। अफरोज़ ने अपने विभाग के लेक्चरर जान कालवेल्ट को कहा कि वो हमें पूरा परिसर घुमा दें।

आज का सबसे महत्वपूर्ण किरदार था जान...। अद्भुत व्यक्तित्व- अमेरिकन होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी, उर्दू बोलना, वेद पुराणों की जानकारी रखना, हिन्दी के कवियों-साहित्यकारों की रुचि पूर्वक बातें करना, सब हमारे लिये कोतूहल का विषय थीं।

जान को मैं तो पहले से जानता था, लेकिन मेरे दोनों साथी ये देख कर बहुत अचम्भित थे। जान ने अपने कीमती समय में से जितना अधिक हो सकता था हमें घुमाया। फिर अपना विभाग दिखाने ले गये। हिन्दी विभाग को देखकर हम लोग रोमांचित और गर्वित होने लगे। वहाँ एशियन स्टडीज नाम से ये विभाग है, इसमे हिन्दी, उर्दू, अरबी हिब्रू आदि भाषाओं के अलग-अलग सेक्शन हैं। हिन्दी की ज़िम्मेदारी अफरोज़ और जान की जान पर है।

यहाँ अमेरिकन, जर्मन, फ्रांस, अफ्रीकन तथा भारत के वो बच्चे जो अमेरिका में पैदा हुये हैं, सभी हिन्दी का ज्ञान लेते हैं। एक ऐसी प्रवासी गुजराती बच्ची से भी मिलना हुआ जो अफरोज़ के अधीनकबीर और साँई बाबा का तुलनात्मकअध्ययन पर शोध कर रही थी। चूँकि परिसर बहुत बड़ा था,चलते चलते थक भी गये थे इसलिये पुस्तकालय और एक चलती हुयी क्लास देखने का मन हुआ। जान हमें पुस्तकालय ले गये यहाँ की दूसरी मंज़िल पर हिन्दी की तमाम किताबें देखने को मिलीं। पुरातन लेखक और कवियों से लेकर अर्वाचीन लेखक-कवियों की पुस्तकें पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रहीं थीं। मैंने और प्रवीन ने भी अपनी अपनी पुस्तकें यहाँ रखने के लिये जान को समर्पित कीं।


फरोज़ जी ने हमें बताया कि पिछले दिनों अमेरिका ने हिन्दी के पोषण के लिये लगभग 4 करोड़ रुपया विभाग को दिया है। जिससे एक हिन्दी सिखाने की वेबसाइट A DOOR IN TO HINDI बनायी गयी है और अमेरिकन बच्चों को अन्य देशों की कला संस्कृति की जानकारी के लिये समय-समय पर अन्य देशों में ले जाने की व्यवस्था के अलावा कई रचनात्मक कार्य हो रहे हैं।

यहाँ पराये देश में हिन्दी के लिये इतना सम्मान और इतना काम देख कर सर्वेश की तो आंखें फटी रह गयीं, प्रवीन अपने देश में हिन्दी की दुर्दशा पर अफसोस व्यक्त कर रहे थे। मेरा मन कह रहा था कि चाहे जो भी हो हमें अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिये।

आज का दिन हम तीनो दोस्तों के लिये जानकारी भरा रहा।-

अमेरिका के संस्मरण--2011..... (जब कोशिकायें धड़क उठीं.....)


इस बार शिकागो में हमारे एक मित्र बबराला निवासी आकाश शर्मा के बड़े भाई सुदेश शर्मा और उनकी भाभी श्रीमती रचना मिश्रा(एटा निवासी) से पहली बार मुलाकात हुई। ये दोनों ही पति-पत्नी बायोटेक्नोलोजी में शोध करने के बाद शिकागो में एक प्रतिष्ठित अस्पताल में साइंटिस्ट हैं। शिकागो शहर में पहुँचने से पहले ही इनके घर जाने का प्रोग्राम तय हो चुका था।

जिस दिन कवि सम्मेलन था उस दिन तो ये लोग अपनी व्यस्तताओ के कारण नहीं आपाये लेकिन अगले दिन प्रात: 9.30 पर दोनों लोग मुझे ले जाने के लिये होतल आगये। उस दिन सुबह से ही मौसम खराब था, तेज़ हवाओं के साथ तेज़ बारिश अपना रंग दिखा रही थी। रास्ते भर गप-शप करते हुये 30 मिनिट बाद हम लोग डाउन टाउन स्थित फ्लेट पर आ गये। रास्ते में सुदेश मुझे जितने जटिल लगे, रचना उतनी ही सरल लगीं। घर में एक बहुत प्यारी सी 8 माह बच्ची थी जिसकी देखभाल गुजरात की एक आया कर रही थी। भारी नाश्ता करने के बाद मुझे लेकर मिशीगन लेक के किनारे ले जाने के लिये जैसे ही बाहर आये, तेज़ हवाओं ने पूरे शरीर को हिलाकर रख दिया।10 कदम चलने के बाद मैंने अपने स्वास्थ्य को देखते हुये आगे चलने के लिये अपनी असमर्थता व्यक्त कीक्यों कि मेरी विवशता थी, अभी 8 प्रोग्राम बाकी थे अगर तबियत खराब हो जाती है तो मेरा तो यहाँ आना बेकार हो जायेगा। मेरे फैसले से ये लोग थोड़े मायूस ज़रूर हुये,लेकिन समय तो काटना ही था इस इरादे से रचना जी ने अपनी लेब दिखाने का प्रस्ताव मेरे सामने रखा, मुझे भी बन्द वातावरण की तलाश थी इसलिये मैंने तुरंत हाँ कर दी।


10 मिनिट पैदल चलने के बाद हम उनकी लेब में पहुँच गये। ये देखना मेरे लिये पहला और नया अनुभव था। दोनों ही लोगों ने बड़े चाव से मुझे एक-एक चीज़ का अवलोकन कराया। फिर रचना जी एक विशेष कक्ष में ले गईं जहाँ वो काम करती हैं। वहाँ उन्होंने बताया- कि हम मानव की हृदय की गति को लम्बे समय तक चलाये रखने के लिये या यूँ कहें मनुष्य ले जीवन को और लम्बा करने के लिये क्या कुछ नया हो सकता है उस पर वर्क कर रहे हैं। दिल का प्रत्यारोपण किस प्रकार हो
, मृत व्यक्ति में नये दिल के माध्यम से पुन:जीवन डालने के दिशा में जो शोध कार्य चल रहे हैं, उनका अवलोकन कराया। जब उन्होंने प्रीज़र्वेटर से निकाल कर हृदय से अलग की गयी एक कोशिका को माइक्रोस्कोप मे दिखाया तो मैंने देखा कि उसके अन्दर का माइट्रोकांड्रिया धड़क रहा है, ये नज़ारा देख कर के मैं तो रोमांचित हो गया। जीवन में चिकित्सकीय अध्ययन के समय प्रयोगशालाओं में मृत कोशिकाओं के माध्यम से ही ज्ञान लिया था लेकिन ये सब देखना तो बस......। जहाँ बाहरी व्यक्ति का जाना निषेध हो वहाँ आपको ये सब देखने को मिल जाये तो मैं समझता हूँ कि बहुत बड़ी बात है। फिर रचना जी ने अपने कम्प्यूटर पर अपने सारे परीक्षणों को एक-एक कर के दिखाया और बच्चों की तरह पढाया। क्यों कि मेडीकल लाइन का हूँ इसलिये मुझे बहुत मज़ा आ रहा था।

और देखते ही देखते 2 बज गये, इतना समय कब बीत गया, पता ही न चला। हम लोग बाहर आ गये। अब मौसम में थोड़ी गर्माहट भी आ गई थी। यहाँ से मुझे डाउन-टाउन दिखाने ले गये, कुछ फोटोग्राफी की, वहीं पर पूर्व निर्धारित समय के अनुसार सुभाष जी, उनकी पत्नी, सर्वेश और प्रवीन मिल गये। सुदेश और रचना जी से सुमधुर यादों के साथ विदा ली और हम सब विवेकानन्द स्मारक की ओर बढ़ गये.....।

अमेरिका के संस्मरण--2011..... (पश्चिम में पुरवाई .....)


कितना सुखद आश्चर्य होता है जब कही कुछ अप्रत्याशित रूप से बहुत दूर अपना सा कुछ मिल जाए |मन करता है इसको अपनी आँखों में भर लू दिल कहता है इसे अपने भीतर समेत लूं और भावनाएं मचल उठती है इनको महसूस करने के लिए |

आप यकीन मानिये हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बीस हज़ार मील दूर हमारी मिटटी इस तरह महकती मिलेगी कि हम उसकी महक को जिंदा नाचते गाते देख ही नहीं सकेंगे बल्कि उसके गवाह भी बन जायेंगे |अमेरिका जिसके बारे में कहा जाता है कि ये देश ऐसा है कि दुनिया भर को अपनी ओर खींचता है और फिर अपने में ही समेत कर उसका अस्तित्व भी ख़त्म कर देता है

लोग़ अमेरिका को ड्रग की तरह समझते हैं जिसकी चपेट में आकर आदमी अपनी पहचान तक खो देता है....

लेकिन हम एक बात अब पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि हिन्दुस्तान का युवा अब समझ गया है कि हमे अपनी विशिष्ट्पहचान बनाए रखने के लिए अपनी मूल पहचान को ज़िंदा रखना पड़ेगा | और यह तभी संभव है जब युवा वर्ग अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराएं तथा अपने रीति रिवाज़ बचाए रखने के लिए मुस्तैदी दिखाए|

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के निमंत्रण पर जब हम (डॉ विष्णु सक्सेना, सर्वेश अस्थाना, डॉ प्रवीण शुक्ल) अमेरिका आये तो हम दोनों उसी गफलत में थे कि युवा वर्ग शामिल नहीं होगा क्योकि हम दोनों के पिछले तीन अनुभव इस बात के साक्षी है कि हिंदी कवि सम्मेलनों में हिंदी भाषियों कि नयी पीढ़ी कभी नहीं आती है सिर्फ अधेड़ और बुजुर्गो के दम पर ही यहाँ हिंदी अपनी साँसे ले रही है प्रवीण की पहली यात्रा होने के कारण उनका इस विषय में कोई ख़ास मत नहीं बन सकता था|


यूनीवर्सिटी आफ नार्थ कोरोलिना की यात्रा ने हमारा ये भ्रम तोड़ दिया और हमें अमेरिका में रह रहे नव वय के भारतीयों पर गर्व करने को विवश कर दिया.| साथ ही ये भी महसूस किया कि हिंदी कि लोकप्रियता व ज़रुरत भी विश्व में बढ़ रही है| हमारे पैरों के नीचे से ख़ुशी से ज़मीन सी खिसकती महसूस हुयी जब इस यूनिवर्सिटी के हिंदी उर्दू विभाग में विशुद्ध सफ़ेद अमेरिकन प्रवक्ता श्री जान काल्ड वेल फर्राटेदार हिंदी उर्दू बोलते हुए मिले | ये हमने ज़िन्दगी में पहली बार देखा था| इस विभाग में प्रोफ़ेसर के पद पर उत्तर प्रदेश के अफरोज ताज साहब है जिनके माध्यम से जान साहब मिले| जान साहब हमे भारतीय संस्कृति के अँगरेज़ झंडाबरदार नज़र आये| शानदार उच्चारण भारत का गहरा ज्ञान ये सिद्ध कर रहा था कि अब वो दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया में लाखों जान कालवेल हिंदी का परचम उठाये हुए हमें गौरव और गर्व दोनों दोनों महसूस करा रहे होंगे|

हम यूनिवर्सिटी का भ्रमण कर रहेथे हिंदी की क्लास में भी गए जहा हिंदी को समझाने के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल हो रहा था, अफरोज साहब ने बताया कि इस क्लास में चूंकि अमरीकन विद्यार्थी भी है इसलिए उनके दिल दिमाग में हिंदी को बिठाने के लिए हम जान बूझ कर उनकी भाषा का प्रययोग कर रहे है जिस से हिंदी उनके भीतर तक स्थापित हो सके. क्योंकि आदमी हमेशा अपनी मात्र भाषा में ही सोचता है हम दोनों की आँखे गीली हो उठीं अपनी मात्र भाषा के प्रचार के प्रति समर्पण भाव देख कर| अमरीकन बच्चे अपनी रूचि को उत्सुकता की सीढियों पर चढ़ कर हिंदी के साथ मिला देना चाहते थे. प्रवीण को भी बहुत हर्ष हुआ.

अफरोज साहब ने बताया कि आज आपको हम वो भावनात्मक द्रश्य दिखाना चाहते है जिसकी आपने कल्पना भी नहीं कि होगी । यहाँ पर रह रही हमारी नयी पीढ़ी अपनी परम्पराओं के प्रति कितनी जागरूक है और उनके प्रसार के लिए कितने प्रयास कर रही है|



अफरोज जी और जान साहब हमें विश्वविद्यालय के उस हिस्से में ले गए जहा वो आयोजन था जिसके बारे में सुन कर ही हमारी उत्सुकता सातवें आसमान पर चढ़ गयी थी. उस खुली जगह पर सैकड़ो हिन्दुस्तानी और अमरीकन तथा नीग्रो स्टुडेंट एकत्र थे. अवसर था हिन्दुस्तानी छात्र छात्राओं द्वारा भारतीय मुस्लिम विवाह का नाट्य प्रस्तुतीकरण यानि रोल माडल प्रजेंटेशन | यह सब यूनिवर्सिटी के अन्य बच्चों को भारतीय परम्पराओं से परिचित कराने के लिए किया गया था|

मुस्लिम विवाह का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन विद्यार्थियों ने किया वो काबिले तारीफ़ था| बाकायदे लड़की वाले और लड़के वाले दोनों पक्ष बनाये गए| कुछ लड़की वाले तो कुछ लड़के वाले, मौलवी भी थे तो गवाह भी थे तो वकील भी मुक़र्रर किये गए थे| एक लड़की अंग्रेजी में एक एक स्टेप बताती चल रही थी अर्थात वो सूत्रधार का काम कर रही थी, हर कदम पर दर्शक तालियाँ बजा कर भारतीय रीति रिवाजों का स्वागत कर रहे थे. मुझे तो खुद पर तरस आया क्योंकि जितना वो विद्यार्थी जानते थे उतना तो हम भी नहीं जानते थे| हज़ारों दर्शकों ने इस डिमास्ट्रेशन का अवलोकन कर उसके बारे में जानकारी पायी | अन्य लोगो में अपनी परम्पराओं और रीति रिवाजों को पहचान इलाने के लिए जो तरीका हमारे नव वय के लोगो ने अमेरिका अपनाया शायद वही सबसे सही तरीका है| शादी की रस्म के बाद दावत भी हुयी जिसमे भारतीय भोजन का पूरा इन्तेजाम था| नाच गाना भी था जिसमे शादी से सम्बंधित गाने ही गाये गए और इन गानों पर बाराती और जनाती विद्यार्थी खूब खुल कर नाचे|

डॉ विष्णु सक्सेना जी ने मेरे और प्रवीण के कंधो पर हाथ रखे और खुशी में डूबी भर्राई आवाज़ में कहा- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

इसी के साथ हम तीनों कवि नकली दूल्हा दुल्हन को बधाई देने उनकी ओर बढ़ गए ....अफरोज साहब नगाड़ा बजाने लगे ..जान साहब तस्वीरें खींचने लगे ..लड़के लडकियाँ नाचने लगे क्योकि गाना ही ऐसा बज रहा था ....ये देश है वीर जवानो का अलबेलो का मस्तानो का ...हम तीनो खुशी से झूमने लगे

-सर्वेश अस्थाना

डा. विष्णु सक्सैना, नोर्थ केरेलाइना यूनिवर्सिटी से....

अमेरिका के संस्मरण--2011.....(जब दुर्घटना होते-होते बची.....)

शिकागो--

हमें रिचमंड से कवि सम्मेलन करने के बाद शिकागो पहुँचना था। सुबह डा. धाकर, राज दुबे, और राम जी एअरपोर्ट पर छोडने आये। बोर्डिंग पास पहले से ही हमारी पास थे, बस सामान चेक इन कराना था। हमने रिचमंड से ही सुभाष पांडे जी को फोन कर दिया था कि आप जब हमें लेने आयें तो बड़ी वेन लेकर ही आयें क्यों कि हम लोगों का सामान अधिक है। शिकागो पहुँचने के बाद बेगेज क्लेम से सामान लेकर हम लोग जैसे ही बाहर निकले तो सुभाष जी गेट पर ही मिल गये। हम लोगों का सामान देखकर थोडा सा चौंके, बोले- गाडी तो पार्किंग मे खड़ी है, आप वहीं सामान लेकर चलिये। शिकागो एअरपोर्ट बहुत बडा होने के कारण हमें सामान ले जाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पहले लिफ्ट में गये, फिर स्वचलित सीढ़ियों से नीचे आना था, ये सीढ़ी बहुत लम्बी थी।

प्रवीन की एक अटेची सुभाष जी ने पकड़ ली थी इसे लेकर वो नीचे उतर गये, दूसरी अटेची स्वयं प्रवीण लेकर आसानी से उतर गये। इसके बाद में अपनी एक अटेची ऊपर ही छोड़ कर सर्वेश से ये कह कर कि कोई जल्दी नहीं है आराम से सामान नीचे उतर जायेगा, लाल वाली अटेची साथ में लेकर आधी सीढ़ियाँ पास कर ही पाया था कि न जाने क्या हुआ सर्वेश अस्थाना ने अपनी वो अटेची जो लगभग 30 किलो की थी उसे उन सीढ़ियों पर रखकर खुद उसके साथ आने का प्रयास किया। क्यों कि अटेची सर्वेश के वज़न के अनुपात से बहुत भारी थी इसलिये सध नहीं पायी और हाथ से छूट गयी, इस हड़बड़ाहट में वो खुद भी उन सीढ़ियों पर नहीं चढ़ पाये। अटेची हाथ से छूटते ही असंतुलित होती हुयी लुढ़कने लगी। ... मैं अभी बीच रास्ते में ही था कि ऊपर से पहाड़ जैसी अटेची आते देखकर मुझे पसीने आने लगे। मुझे लग रहा था कि ये भारी अटेची अभी मेरे ऊपर आयेगी और मुझे धकियाते हुये या मेरे ऊपर से गुजरते हुये मुझे अपने साथ लुढ़्काती हुयी ले जायेगी। मैं तो एक दम विचार शून्य हो गया... अनहोनी की आशंका से मेरी आँखें बंद हो गयीं..... भगवान का नाम लेने लगा, तभी एक चमत्कार हुआ, जो अटेची कुछ पल पहले सीधी मेरे ऊपर आरही थी अचानक एक फुट दूर से उसने अपना रास्ता बदला, मुझे छेड़े बगैर मेरी अटेची जिसे मैंने डर की वजह से कस के पकड रखा था उसे थोड़ा सा छूती हुयी नीचे की ओर धड़ाधड़ लुढ़क कर ज़मीन पर जाकर टिक गयी।

इस दौरान नीचे खड़े प्रवीण और सुभाष जी की, बीच में मेरी और ऊपर खुद सर्वेश की जान अधर में अटकी हुयी थी यही सोचकर कि कोई अनहोनी न हो जाये। लेकिन प्रभु कृपा से एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। संयोग से उस पूरी सीढी पर हम तीनों के अलावा कोई नहीं था। अगर कोई अमेरिकन या उसका कोई बच्चा उस पर चल रहा होता और अटेची उसे कोई नुकसान पहुँचा देती तो पराये देश में लेने के देने पड़ जाते।

यही सोचकर जब सर्वेश अस्थाना अपना बचा हुआ सामान लेकर नीचे आये तो मैंने उन पर परिस्थितिजन्य थोड़ी सी नाराज़गी जतायी जिसे उन्होंने अपना अपमान समझा और फुरसत के क्षणों में होटल में आकर मेरे ऊपर अपनी भड़ास निकाली। मेरे और प्रवीण के द्वारा प्यार से समझाने पर उन्हें अहसास हुआ कि आज बहुत बड़ी अनहोनी होने से बच गयी। हम तीनों ने उसी समय तय किया कि घर जाकर प्रभु का धन्यवाद देते हुये प्रसाद चढ़ायेंगे।

अगले दिन सुभाष जी के साथ जब हम मन्दिर देखने गये तो इस पुनीत कार्य को भारत की बजाय यहीं सम्पन्न करना अधिक उचित समझा। मैंने वहीं पर 101 रुपये हाथ में लेकर दोनों लोगों का हाथ लगवा कर मन्दिर की दानपेटी में भेंट कर दिये। तब कहीं जाकर मन को शांति मिली...।

अमेरिका के संस्मरण--2011.....(यारों के यार, अशोक कुमार.....)


डलास- टेक्सास--

मोदी नगर, गाज़ियाबाद निवासी अशोक कुमार जी पिछले 35 वर्षों से अमेरिका के टेक्सास प्रांत के डलास शहर में रह रहे हैं। बाहरी बनावट देख कर उनके व्यक्तित्व और उनकी सहजता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उनका मस्त स्वभाव, फक्कड़ पहनावा, लापरवाह रहन-सहन उनके वीत रागी होने का परिचायक है। जब हँसेगे तो खुलकर हँसेगे, जब हँसायेंगे तो जीभर के हँसायेंगे। विलक्षण स्मरण शक्ति के धनी, पूरे अमेरिका की भोगोलिक जानकारी के लिये इंसैक्लोपीडिया कहे जाने वाले अशोक कुमार जी हृदय से बडे भले भी हैं। कवियों की मदद करने में सबसे आगे रहते हैं। सुरेन्द्र सुकुमार बताते हैं कि अमेरिका में मेरी आमदनी कराने के लिये मेरी केसिटों की अनेकों कोपी कराके काव्य प्रेमियों तक पहुँचाई। ऐसे उदारमना अशोक जी को हिन्दी काव्य जगत के सभी प्रसिद्ध कवि अच्छी तरह जानते हैं।

मेरी जान पहचान 1996 से है, जब मैं पहली बार अशोक चक्रधर और प्रदीप चौबे के साथ अमेरिका गया था। फिर दूसरी और तीसरी बार उनके ही द्वारा संयोजित कविसम्मेलनों मे गया। उन दिनों अशोक जी को बहुत नज़दीक से देखने का मौका मिला। तब वो एक छोटे से एपार्ट्मेंट में रहा करते थे। पारिवारिक परिस्थितियों से निरंतर जूझते हुये भी हमेशा मस्त दिखाई दिये। मैं इन्हें तब से ही बड़े भाई का दर्ज़ा देता हूँ। जिसको दिल से अपना मान लिया उसके लिये सर्वस्व लुटाने को आतुर रहने वाला यह शख्स आज भी कवि मित्रों को लम्बी ड्राइव करके लाने ले जाने का शौकीन है। बिना किसी स्वार्थ के कवियों की हर प्रकार की सेवा करने में इन्हें मज़ा आता है।

कडी मेहनत करके एक-एक पैसा जोडकर आज एक आलीशान घर में अपनी नई पत्नी श्रीमती ज्योति अरोरा के साथ अपना पारिवारिक सुखमय जीवन जी रहे हैं। भगवान इस परिवार को किसी की नज़र न लगाए, मेरी अनंत शुभकामनायें.......

अमेरिका के संस्मरण----2011.....(जब हम उम्मीद से पहले पहुँच गये.....)

कनाडा -

टॉरेंटॉ----

न्यूयार्क का कार्यक्रम करने के बाद हमें न्यूयार्क शहर घूमने के लिये पर्याप्त रूप से दो दिन मिले थे, बुधवार को न्यू जर्सी मे सुरेन्द्र तिवारी के निवास पर डिनर में शामिल होकर, श्री केशरी नाथ त्रिपाठी के सानिध्य में कवि गोष्ठी करके गुरुवार की सुबह कनाडा के लिये रवाना होना था।

सुरेन्द्रनाथ तिवारी परमाणु संस्थान में बहुत बडे इंजीनियर हैं, उन्हें अपने काम पर जाना था तो हम लोगों को सुबह ही नेवार्क एअर पोर्ट पर छोड कर अपने वर्क पर चले गये।

हमारी उड़ान न.126 थी, जब हम सामान चेक इन कर रहे थे तो हमें कहा गया के उड़ान न.124 उससे पहले जा रही है, अगर आप चाहें तो मै आपको उसमें भेज सकता हूँ। हमने मना कर दिया, हमारा जो निर्धारित जहाज है हम उसी में जायेंगे।

सुरक्षा जाँच के बाद हम लोग निर्धारित गेट पर आ गये। मौसम बहुत खराब हो रहा था। दो घंटे बाद घोषणा हुयी कि 126 का कोई समय निश्चित नही है, जिन यात्रियों को टोरेंटो जाना है वो उड़ान न. 124 में अपना बोर्डिंग पास बदलवा के बैठ सकते हैं। हम लोग पहले ही बहुत लेट हो गये थे, सो बिना विचारे औपचारिकतायें पूरी कर के 124 में बैठ गये।

संकट अब शुरू हुआ। टोरेंटो के आयोजकों को ये पता कि हम 126 से आ रहे हैं जिसकी सूचना टोरेंतो मे ये दी जा रही है कि ये अनिश्चित कालीन लेट है। हम 124 में बैठ चुके हैं,जिसकी सूचना हम उन्हें इसलिये नही दे सकते कि जहाज में बैठते ही समिति द्वारा दिया गया मोबाइल डेड हो गया, कनाडा में भी ये काम इसलिये नहीं करेगा क्योंकि इसमें इंटरनेशनल रोमिंग नहीं है। मैं और प्रवीण चिंता में और सर्वेश निद्रा में मग्न थे। मौसम बहुत खराब था बार बार बेल्ट बाँधने के लिये बोला जा रहा था, भयंकर डबडबाता हुआ जहाज कई आशंकायें पैदा कर रहा था। जैसे-तैसे हम कनाडा के एक छोटे से आइलेंड पर उतरे। ये भी एक रोमांचक अनुभव था, जब हमारा जहाज लेंड कर रहा था तो ऐसा लग रहा था कि समुद्र मे उतर रहा है। जब वह छोटी सी हवाई पट्टी पर उतरा तो खिड़की से साफ दिखाई दे रहा था कि समन्दर की तेज़ लहरे रन-वे पर थपेड़े मार रहीं थीं।

दूसरा देश था इसलिये इम्मीग्रेशन की लाइन में भी लगना पड़ा। फिर बेगेज क्लेम से सामान लेकर फेरी की तरफ बढ़े। फेरी एक प्रकार का छोटा सा स्टीमर होता है जो यात्रियों को इस किनारे से उद किनारे ले जाता है।

हमारा जब तक नम्बर आया तब तक एक फेरी यात्रियों को लेकर जा चुकी थी। 30 मिनिट के बाद जब दुबारा आयी तो हम सब उसमें बैठे। हमारा पहुँचने का जो समय था उससे एक घंटा अधिक हो गया था, अब समस्या ये थी कि हमारा तो यहा फोन भी काम नहीं कर रहा, टोरेंटो वालों को कैसे बतायें कि हम आ चुके हैं, जब कि वो लोग हमारा इंतज़ार करके जाने की तैयारी में थे, तभी दिमाग में आया कि प्रवीन के पास जो फोन है उसे देखें, देखा तो उसमें सिगनल आ रहे थे, उससे जैसे ही हमने ग्यानेश पालीवाल को फोन मिलाया तो वो एक दम चौंक कर बोले कि आप अभी न्यूयार्क से चले या नहीं, हमने कहा- हम टोरेंटो आ गये हैं। ये सुन कर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

बेसब्री से इंतज़ार कर रहे श्रीमती एवम श्री श्याम त्रिपाठी, ज्ञानेश एवम अंशु पालीवाल ने हमारा फूलों से स्वागत किया। गाडियों में सामान लदवा कर रास्ते में जब उन्हें पूरा हाल सुनाया तो उन्होंने राहत की सांस ली और भगवान का लाख-लाख शुक्रिया अदा किया।

हमने बिल्कुल देर नहीं की....(अमेरिका संस्मरण)


हमारी इस पूरी श्रंखला का सबसे शानदार कार्यक्रम शहनाई बेंक्वट हाल में हुआ । बेहतर लोग, उत्तम व्यवस्थायें, शानदार वातावरण, और अनुकूल मौसम,,,।

श्री सुभाष पांडे उ.प्र. एसोसिएशन के अध्यक्ष, एअर पोर्ट से सीधे अपने घर पर खाना खिलाकर एक अच्छे होटल में छोड़ गये। जाते समय कहा कि आप लोग ठीक 4-45 पर तैयार हो जाइये मैं आपको शाम के कार्यक्रम के लिये लेने आउंगा। उनके इस वक्तव्य पर गुस्सा तो बहुत आरहा था, क्यों कि शुक्रवार,शनिवार, रविवार,इन तीन दिनों में इतना हेट्रिक हो जाता है कि आराम करने के लिये वक्त ही नही मिलता है। अभी तीन बजे हैं और 4.45 पर तैयार रहना है, इतनी देर में आराम भी करना, नहाना, कपड़ों पर प्रेस भी करना....ओह...

सुभाष जी ने हमें 4.40 पर फोन किया कि मैं रास्ते में हूँ, जब कि वो अभी घर से निकले ही नही थे, हम लोग देर न करें और थोडा मार्जिन रखकर तैय्यार रहें इसलिये थोड़ा सा झूठ बोला । हम थीक 4.44 पर लाबी में आगये। सुभाष जी को आने में 4 मिनिट की देरी हो गयी। वो जैसे ही लाबी में आये, हमें पहले से ही वहा बैठा देखकर चौंक गये। फिर अपनी घड़ी की तरफ देखा, थोडा सा शर्मिंदा हुये, बोले- मैं तो जीवन में पहली बार देख रहा हूँ कि कवि/ आर्टिस्ट इतने समय के पाबन्द होते हैं। अभी तक 16 आयोजन करा चुका हूँ, ये पहली घटना है कि आपने हमें बिलकुल इंतज़ार नहीं कराया

ये हमारा पहला इम्प्रेशन था।

फिर कार्यक्रम में जो हम तीनों ने अपना-अपना जलवा बिखेरा तो हमारी प्रतिष्ठा मे चार चाँद लग गये। कार्यक्रम अध्यक्ष् श्री घनश्याम पांडे ने तो अपने आभार वक्तव्य में ये तक कह दिया कि आज हम जितना हँसे हैं उससे अधिक विष्णु सक्सैना जी की कविताओं ने हमें रुलाया भी है। ये हमारे शिकागो मे होने वाले सबसे अच्छे तीन कार्यक्रमों में से एक है।

अगले दिन सुभाष जी ने अपने काम से छुट्टी लेकर हमें डाउन टाउन, मिशीगन लेक, मन्दिर, विवेकानन्द जी ने जहा पहला भाषण दिया वो जगह बड़े ही स्नेह के साथ दिखाई, जिन्हें देख कर हम अभिभूत होते रहे...।