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अमेरिका के संस्मरण--2011.....(जब दुर्घटना होते-होते बची.....)

शिकागो--

हमें रिचमंड से कवि सम्मेलन करने के बाद शिकागो पहुँचना था। सुबह डा. धाकर, राज दुबे, और राम जी एअरपोर्ट पर छोडने आये। बोर्डिंग पास पहले से ही हमारी पास थे, बस सामान चेक इन कराना था। हमने रिचमंड से ही सुभाष पांडे जी को फोन कर दिया था कि आप जब हमें लेने आयें तो बड़ी वेन लेकर ही आयें क्यों कि हम लोगों का सामान अधिक है। शिकागो पहुँचने के बाद बेगेज क्लेम से सामान लेकर हम लोग जैसे ही बाहर निकले तो सुभाष जी गेट पर ही मिल गये। हम लोगों का सामान देखकर थोडा सा चौंके, बोले- गाडी तो पार्किंग मे खड़ी है, आप वहीं सामान लेकर चलिये। शिकागो एअरपोर्ट बहुत बडा होने के कारण हमें सामान ले जाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पहले लिफ्ट में गये, फिर स्वचलित सीढ़ियों से नीचे आना था, ये सीढ़ी बहुत लम्बी थी।

प्रवीन की एक अटेची सुभाष जी ने पकड़ ली थी इसे लेकर वो नीचे उतर गये, दूसरी अटेची स्वयं प्रवीण लेकर आसानी से उतर गये। इसके बाद में अपनी एक अटेची ऊपर ही छोड़ कर सर्वेश से ये कह कर कि कोई जल्दी नहीं है आराम से सामान नीचे उतर जायेगा, लाल वाली अटेची साथ में लेकर आधी सीढ़ियाँ पास कर ही पाया था कि न जाने क्या हुआ सर्वेश अस्थाना ने अपनी वो अटेची जो लगभग 30 किलो की थी उसे उन सीढ़ियों पर रखकर खुद उसके साथ आने का प्रयास किया। क्यों कि अटेची सर्वेश के वज़न के अनुपात से बहुत भारी थी इसलिये सध नहीं पायी और हाथ से छूट गयी, इस हड़बड़ाहट में वो खुद भी उन सीढ़ियों पर नहीं चढ़ पाये। अटेची हाथ से छूटते ही असंतुलित होती हुयी लुढ़कने लगी। ... मैं अभी बीच रास्ते में ही था कि ऊपर से पहाड़ जैसी अटेची आते देखकर मुझे पसीने आने लगे। मुझे लग रहा था कि ये भारी अटेची अभी मेरे ऊपर आयेगी और मुझे धकियाते हुये या मेरे ऊपर से गुजरते हुये मुझे अपने साथ लुढ़्काती हुयी ले जायेगी। मैं तो एक दम विचार शून्य हो गया... अनहोनी की आशंका से मेरी आँखें बंद हो गयीं..... भगवान का नाम लेने लगा, तभी एक चमत्कार हुआ, जो अटेची कुछ पल पहले सीधी मेरे ऊपर आरही थी अचानक एक फुट दूर से उसने अपना रास्ता बदला, मुझे छेड़े बगैर मेरी अटेची जिसे मैंने डर की वजह से कस के पकड रखा था उसे थोड़ा सा छूती हुयी नीचे की ओर धड़ाधड़ लुढ़क कर ज़मीन पर जाकर टिक गयी।

इस दौरान नीचे खड़े प्रवीण और सुभाष जी की, बीच में मेरी और ऊपर खुद सर्वेश की जान अधर में अटकी हुयी थी यही सोचकर कि कोई अनहोनी न हो जाये। लेकिन प्रभु कृपा से एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। संयोग से उस पूरी सीढी पर हम तीनों के अलावा कोई नहीं था। अगर कोई अमेरिकन या उसका कोई बच्चा उस पर चल रहा होता और अटेची उसे कोई नुकसान पहुँचा देती तो पराये देश में लेने के देने पड़ जाते।

यही सोचकर जब सर्वेश अस्थाना अपना बचा हुआ सामान लेकर नीचे आये तो मैंने उन पर परिस्थितिजन्य थोड़ी सी नाराज़गी जतायी जिसे उन्होंने अपना अपमान समझा और फुरसत के क्षणों में होटल में आकर मेरे ऊपर अपनी भड़ास निकाली। मेरे और प्रवीण के द्वारा प्यार से समझाने पर उन्हें अहसास हुआ कि आज बहुत बड़ी अनहोनी होने से बच गयी। हम तीनों ने उसी समय तय किया कि घर जाकर प्रभु का धन्यवाद देते हुये प्रसाद चढ़ायेंगे।

अगले दिन सुभाष जी के साथ जब हम मन्दिर देखने गये तो इस पुनीत कार्य को भारत की बजाय यहीं सम्पन्न करना अधिक उचित समझा। मैंने वहीं पर 101 रुपये हाथ में लेकर दोनों लोगों का हाथ लगवा कर मन्दिर की दानपेटी में भेंट कर दिये। तब कहीं जाकर मन को शांति मिली...।

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