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संस्मरण- गुम हुआ ब्रीफकेस

जब जब चेन्नई एयरपोर्ट पर उतरता हूँ, तब तब एक पुरानी घटना मुझे रोमांचित कर कभी गलती न करने की प्रेरणा देती  रहती है।
आज भी जब अजात शत्रु और शम्भू शिखर के साथ चेन्नई की धरती पर पैर रखा है तो पुरानी दुर्घटना चलचित्र की भांति आंखों के सामने तैर रही है....
कितने वर्ष पहले की बात है ये तो अनुमान नहीं लेकिन घटना है बहुत खतरनाक। विगत लगभग 10 वर्ष पहले चेन्नई आना हुआ था एक कवि सम्मेलन में। जिस फ्लाइट में मैं था उसी में वेदव्रत बाजपेयी, अनु सपन समेत दो कवि और थे। वेदव्रत उस वक्त के व्यस्ततम कवियों
में गिने जाते थे इसलिए उनका सूटकेस बड़ा होता था। मेरी अटेची छोटी सी थी।
जब हम एयरपोर्ट पर उतरे तो एक ही ट्राली में सभी का सामान रख लिया गया। मेरा ब्रीफकेस छोटा सा था इसलिए ट्रॉली के पीछे वाले स्पेस में ऐसा फिट होगया की सामान्य रूप से इन लोगों की बड़ी अटेचियों में दिखाई भी नहीं दे रहा था। मेरा व्यक्तित्व भी शुरू से मेरे ब्रीफकेस की तरह ही रहा है। जैसे ही गाड़ी हमे लेने आई हम सब लोग रईसों की तरह बिना ये परवाह किये कि हमारा समान भी गाड़ी में जाना है, जल्दी जल्दी कूद कर गाड़ी में बैठ गए। सोचा ये काम तो ड्राइवर का है, रख ही लेगा। खैर ड्राइवर ने सब सामान गाड़ी में रख लिया और होटल की तरफ चल दिया। एयरपोर्ट से होटल तक का रास्ता एक घंटे का था। हम होटल पहुचे, पहले खुद उतरे फिर समान। सबकी अटेचियाँ तो उतर गईं लेकिन मेरी अटेची जब नही उतरी तो मैं परेशान हो गया। ड्राइवर से पूछा तो उसने बताया ट्राली में जितना सामान था मैंने रख लिया था। ड्राइवर भी बेचारा घबरा उठा, मेरी तो हालात ही खराब हो रही थी, सारे कपड़े उसी में थे, रात को प्रोग्राम कैसे करूँगा ये विचार तेज़ी से आ जा रहे थे। मुझे कन्फर्म हो गया अटेची ट्राली के उस स्पेस में फिट आने की वजह से ड्राइवर को दिखाई नहीं दी और वहीं रह गयी। मैंने ड्राइवर को वापस एयरपोर्ट चलने को बोला इस उम्मीद में कि शायद मिल जाए। एक तरफ यह भी लग रहा था कि इतने बड़े एयरपोर्ट पर कौन छोड़ेगा उस अटेची को इतनी देर। एक स्थानीय व्यक्ति को साथ लिया जिससे की तमिल भाषा समझने में आसानी हो सके। एक घंटे का
सफर करके जब एयरपोर्ट दुबारा पहुंचा तो पूरा माहौल बदला हुआ दिखा। पूरा एयरपोर्ट छावनी में बदल चुका था। हर तरफ सुरक्षा गार्ड, चारों ओर डॉग स्क़वेड दौड़ रहे थे। बहुत आश्चर्य हुआ यह देखकर। फिर मैंने सोचा शायद प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति आ रहे होंगे इसीलिए इतनी सुरक्षा व्यावस्था कडी कर दी है।
मैंने हिम्मत करके एक सुरक्षा गार्ड से कहा-भैया मेरी एक छोटी सी अटेची किसी ट्रॉली पर छूट गयी है। उसने मुझे घूर कर देखा- बोला, वो सामने वाले साहब हैं उनके जाकर मिलो। मैं उन साहब के पास गया और उनसे भी वही प्रश्न दुहराया। वो गुर्राते हुए बोला- अच्छा!  हम तुम्हारे नोकर हैं जो तुम्हारे ब्रीफकेस की देखभाल करें, जाइये अंदर बड़े वाले एयरपोर्ट अधिकारी के पास वो बताएंगे आपको। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है। आर्मी के लोग इधर से उधर भाग रहे थे। मै अधिकारी के ऑफिस में पहुँचूँ उससे पहले ही एक सिपाही ने रोक लिया- मैंने कहा- भैया मेरा सूटकेस....बस इतना ही कह पाया था कि उसने मुझे डांटते हुए कहा- अच्छा , वो तुम्ही हो? तुम्हारी वजह से 2 घंटे से इतनी आर्मी परेशान है। पूरा एयरपोर्ट डिस्टर्ब हो गया है। चलिये अंदर.....वो मुझे अंदर लेकर गया। मेरे बारे में बताया तो अधिकारी बोले...आइये ..आइये।
मैं डरा सहमा सा नमस्कार करने लगा।
उसने मेरी नमस्ते का कोई जबाब नही दिया। मुझसे ब्रीफकेस छूटने के कारण पूछा। मैंने विस्तार से बताया तो वह लापरवाह होकर बोला आपके ऊपर इस अपराध के लिए फाइन लगेगा। देख लीजिए अपनी अटेची को । मैने देखा मेरी अटेची का ताला तोड़ा जा चुका था सभी सामान बाहर निकाल कर उसकी अलग अलग गिनती करके मुझे पेनाल्टी की रसीद हाथ मे दे दी। मेरा समान सब ज़मीन पर बिखरा पड़ा था और रसीद हाथ मे। पेनाल्टी 6000 हज़ार रुपये। मैंने उनसे बहुत विनती की, माफी भी मांगी, पेनाल्टी कम करने की भी गुहार लगाई लेकिन कोई असर न हुआ अधिकारी पर। उसने कहा- भविष्य में आपको यह सबक देने के लिए पेनल्टी लगाई गई है। आपकी इस छोटी सी भूल ने हमारी आर्मी का, डॉग स्क्वेड का तथा पूरे सुरक्षा सिस्टम का जो 2 घंटा खराब किया है उसका हर्जाना तो आपको देना ही पड़ेगा। आतंकवाद का समय है, लावारिस कोई भी वस्तु संदिग्ध दिखती है तो हमारा पूरा सिस्टम हरकत में आजाता हैं हमारी छोटी सी चूक से बहुत बड़ी दुर्घटना घट सकती है। ये हर्जाना तो देना ही होगा।
बाय द वे, उस वक्त मेरे पास रुपये थे। मैने उनसे बहस करना उचित न समझा।क्यो कि मैं गलती पर था। पेनल्टी के पैसे भरे, रसीद ली और अपना ब्रीफकेस लेकर जैसे ही चलने लगा। एयरपोर्ट अधिकारी ने खड़े होकर कहा- मिस्टर सक्सैना, फ्यूचर में कभी भी अपने सामान को छोड़ कर कहीं मत जाइए। गाड़ी में भी पहले अपना सामान रखिये फिर बैठिए।
मैंने सहमति में सिर हिलाया, धन्यवाद दिया और अटेची लेकर एयरपोर्ट से वापस होटल आकर राहत की सांस ली। तब से आज तक ऐसी गलती मुझसे नहीं हुई। जब जब चेन्नई एयरपोर्ट पर उतरता हूँ, ये घटना याद करके सिहर जाता हूँ।
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संस्मरण- अरे, इसे सीधा तो करिये विष्णु भगवान****

****अरे, इसे सीधा तो करिये विष्णु भगवान**** ( एक मजेदार संस्मरण )

अभी चार दिन पहले की ही तो बात है। साहित्य गंधा के संपादक श्री सर्वेश अस्थाना ने बताया कि सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि माननीय राज्यपाल श्री रामनाईक होंगे, तभी से उनसे मिलने की इच्छा प्रबल हो रही थी। 11 नवंबर को यह आयोजन होना था। एक दिन पहले मैं वहीं था, तो रुक जाना बेहतर समझा। वैसे भी कायदे से मुझे रुकना ही था। क्यों कि एक तो मैं सहित्यगन्धा के संपादक मंडल में मैं परामर्श दाता के पद पर हूँ, दूसरे हमारे आदरेय श्री कृष्ण मित्र जी को  अनवरत गंधा सम्मान भी मिलना था। तो उनके सम्मान में शरीक होना मेरा दायित्व बनता है। दो दिन पहले जब बोर्ड की मीटिंग हुई तो मैंने सर्वेश जी से मज़ाक में कहा, भाई कोई ऐसा काम भी कर देना जिससे मेरा फोटो भी राज्यपाल के साथ खिंच जाए। वो बोले- दादा, कैसी बात करते हो, आप स्वागत समिति में रहेंगे और माननीय राज्यपाल जी का बुके देकर सम्मान भी करेंगे। मैंने मन ही मन सोचा, अरे ये मज़ाक तो सच होने जा रहा है। लेकिन अगले ही 10 मिनिट में सर्वेश ने आदेश दिया- दादा, आप को राज्यपाल जी का जीवन परिचय भी प्रस्तुत करना है। राष्ट्रगान के बाद सीधे आपसे ही यह कार्यक्रम शुरू होगा। हमने सर्वेश को संदेह की दृष्टि से देखा फिर कहा- कहीं तुम हमसे तफरीह तो नहीं ले रहे? वे बोले  नहीं दादा हम सच कह रहे हैं। आप जैसा व्यक्ति अगर यह दायित्व पूरा करता है तो हमारे तो कार्यक्रम की गरिमा में चार चांद लग जाएंगे। चश्मे से झांकती हुई उनकी आंखों में हमे सत्यता लगी तो हमने तुरंत हाँ कर दी। कार्यक्रम वाले दिन सुबह से ही तैयारियां चल रहीं थीं। सुबह से ही सर्वेश फोन पर लोगो को आमंत्रित करने पर लगे हुए थे। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगो की उपस्थिति से था। मैं भी राज्यपाल का जीवन परिचय का कई बार रिवीजन कर चुका था, कहीं पढ़ने में कोई शब्द छूट न जाए।
शाम 4 बजे हम सब जब तैयार होकर हाल में गए तो हमने देखा सभागार में सभी आगुन्तको की सीट पर नाम लिखे थे। हमारा कही नाम ही नहीं था। हमने प्रबंध संपादक श्री अभय निर्भीक से पूछा - क्या हम खड़े ही रहेंगे? हमारी या हम लोगों की कौन सी जगह है? अभय मुस्कुराते हुए बोले- नहीं सर, हम खड़े रहेंगे, क्यों कि हम बैठ गए तो प्रोग्राम बैठ जाएगा...... आपकी सीट तो राज्यपाल जी के बराबर में है, आपको वहां बैठना है.......वो देखिए....(उंगली से इशारा करते हुए बताया) हमें उसकी बात पर यकीन नही हुआ, हमने पास जाकर देखा तो बात बिल्कुल सही थी। प्रभु को धन्यवाद दिया कि उसने ये दिन भी हमे दिखा दिया कि भारत देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तरप्रदेश के गवर्नर के बराबर में बैठने का सौभाग्य हमे दे दिया। हम फूले नहीं समा रहे थे लेकिन अगले ही पल स्वयं को संयत किया। ठीक साढ़े 4 बजे राज्यपाल जी के आने की हलचल हो गयी। अगले ही पल वह हाल के अंदर आकर अपनी सीट पर बैठ गए। सभी निर्धारित लोगो को उनके अगल बगल बैठने की घोषणा संचालिका द्वय श्रीमती वत्सला पांडे और सोनरूपा ने की (बैठने वालों में एक हम भी थे)
सर्व प्रथम राष्ट्रगान हुआ, तुरंत बाद माइक पर मुझे बुला लिया गया। मैंने आकाशवाणी उदघोषक के लहजे में 4 मिनिट में पूरा परिचय पढ़ा और अपने स्थान पर बैठ गया। इसके बाद स्वागत समिति द्वारा राज्यपाल जी का एक एक करके स्वागत कराया गया। तभी मेरे अंदर नकारात्मक विचार आने लगे- कहीं मेरा नाम लिस्ट में लिखने से तो नही राह गया, आदि, आदि। लेकिन सर्वांत में मेरा जब नाम बोला गया तो मैं भागकर उस जगह गया जहां बुके रखे थे लेकिन बीच मे ही धवल मिल गये बोले-ताऊ जी ये लो। मैं आनन फानन में घबराहट के साथ बुके लेकर जैसे ही प्रदेश के प्रथम नागरिक राज्यपाल जी के पास गया, तो पहले तो वो मुस्कुराए फिर खुद ही उल्टे बुके को सीधा करते हुए बोले- अरे इसे पहले सीधा तो करो विष्णु भगवान!
मैं भी अपनी घबराहट को अपनी मुस्कान में दबाते हुए बोला- सर आपसे मिलने की उत्सुकता ने सब उल्टा पुल्टा कर दिया और बुके भी उल्टा हो गया। आस पास के अन्य लोगों को मेरी इस गलती का अहसास भी नहीं हुआ, मैं जानूँ या राज्यपाल, हा हा हा हा हा......

संस्मरण- हरी जैकेट

*******हरी जैकेट********

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है। 20 नवंबर को उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में जाना हुआ। वहां के जिलाधिकारी कैप्टन श्री प्रभांशु जी के आमंत्रण पर एक कॉम्पेक्ट काव्यसंध्या का आयोजन किया गया था। प्रभांशु जी आगरा और अलीगढ़ में अपर जिलाधिकारी रह चुके हैं इसलिए पूर्व परिचित थे। मेरे अलावा श्री वसीम बरेलवी,श्री कुंवर बेचैन, सरिता शर्मा और सर्वेश अस्थाना। मुझे ट्रेन से ही जाना था इसलिए एक दिन पहले मैंने उन्हें फोन किया कि सर स्टेशन किसी को रिसीव करने भेज देना। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि आप चिंता न करे स्टेशन पर सिटी मजिस्ट्रेट आपको रिसीव करेंगे। वैसे तो मैं आता लेकिन मेरी मीटिंग है इसलिए वो आपको लेने आएंगे। समय से एके घंटे लेट मेरी ट्रेन गोंडा स्टेशन पहुँची। सिटी मजिस्ट्रेट साहब एक गुलदस्ता लिए मेरे कोच के सामने खड़े थे। इस तरह कोई यात्रा समाप्ति पर मिल जाये तो समझ लो यात्रा की थकान फुर्ररर। जैसे कि हम लोगों की आदत होती है हर चीज के लिए पहले आश्वस्त होना चाहते है। उसी के मद्दे नज़र मैं पूछ बैठा- सर हम लोगों के लिए जो होटल किया गया है वह ठीक है?  उन्होंने बताया बहुत अच्छा है सब कुछ। रास्ते मे ही जिलाधिकारी महोदय का फोन आया कि इन्हें सीधे मेरे घर पर लाया जाए। सिटी मजिस्ट्रेट साहब बोले सर अब होटल जाने से पहले साहब के घर जाना होगा उन्होंने बुलाया है। गाड़ी जिलाधिकारी के बंगले की तरफ दौड़ने लगी। भव्यतम प्रवेश के बाद आलीशान बंगले में दाखिल हुए तो अंदर से नोकर आया बोला साहब ने अंदर ही बुलाया है। मैं अंदर गया तो देखा यह तो डाइनिंग हाल है। प्रभांशु जी दौड़ कर आये और गले लगा लिया कुशल क्षेम पूछी, डाइनिंग टेबल तक ले गये तो देखा वसीम साहब बैठे नाश्ता कर रहे थे। उन्हें अभिवादन किया, और कुर्सी पर बैठ गया। तुरंत मेरे लिए भी नाश्ता आया। भूख तो बहुत जोर की लगी ही थी देखते ही देखते 2 पराठे उदरस्थ कर लिये। प्रभांशु जी बहुत दिनों बाद मिले थे, लेकिन उनके अंदर का कुछ भी नही बदला था, वही हंसी, वही फुर्ती, वही स्मार्टनेस। आज तो हरी जैकेट में बहुत सुंदर और हरे भरे लग रहे थे। पहली ही नज़र में जैकेट इतनी भा गयी कि कह दूं कि ये मुझे दे दो। लेकिन यह कहना अशिष्टता लगी और मन को समझा लिया। तभी प्रभांशु जी बोले- विष्णु जी आप होटल में नहीं रुकेंगे। आप हमारे अतिथि हैं इसलिए हमारे आवास पर ही रहेंगे। ये सामने वाला रूम आपका है। खूब आराम करिये, नहाइये, फिर लंच लीजिये, जो मन हो बनवाइये, पूरा बंगला आपके हवाले है आप मालिक हैं। मैं शाम को मिलता हूँ मेरी कुछ ज़रूरी मीटिंग्स हैं। उन्हें निपटा लूँ। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। इस तरह किसी जिलाधिकारी के आवास पर रुकने का अपनत्व भरा मेरा यह पहला अनुभव था। तभी कुक ने पूछा आप लोग लंच कितने बजे लेंगे। वसीम साहब तपाक से बोले- देखिए भाई मैं तो इतना खा चुका हूँ कि अब लंच की गुंजायश नहीं बची। तभी मैंने सोचा कहीं वसीम साहब की बात ये कुक सही न मान ले और लंच की छुट्टी कर दे।
मैंने तुरन्त ही कहा- भैया मैं तो करूंगा...।
सर कितने बजे?
मैंने कहा-2 बजे।
क्या बनाऊं?
-लौकी की सब्जी ( सुन कर कुक की त्योरियां चढ़ीं,)
सर,दाल?
मैंने कहा-मूँग मसूर की कोई भी चलेगी।  अजीब सा मेन्यू सुनकर
कुक परेशान सा हुआ और अंदर चला गया। मुझे लगा ये एक जिलाधिकारी के कुक के लिए मुश्किल भरा टास्क था।
मुझे उसकी परेशानी आनंद देने लगी अगले ही पल मुस्कुराते हुए प्रभांशु जी बाहर निकल गए और हम मुस्कुराते हुए अपने कमरे के अंदर।
कमरा क्या था पूरा 30×30 का हाल था। सारी सुविधाओ से सुसज्जित। बाथरूम, बाप रे बाप इतना बड़ा की व्यक्ति भाग भाग कर नहाए।
लेकिन हर पल यह अनुभूति होती रही कि हम जिलाधिकारी के भव्य आवास में अतिथि हैं। बार बार प्रभु को धन्यवाद देना का मन करता, भगवान ने है हमें कविता की सौगात देकर संसार के सारे सुख दे डाले हैं और क्या चाहिए। सुशील पत्नी दे दी, दो आज्ञाकारी बेटे दे दिए, सारी संपन्नता, सम्मान, इज़्ज़त और क्या चाहिए....सही मायने में मुझे ऊपर वाले से कोई शिकायत नहीं है। बस एक कसक है कि माँ के आंखों ने तो यह सब देख लिया लेकिन पिता की आंखे ये सब कुछ न देख पायीं वो इस संसार से बहुत पहले ही कूच कर गए।(ओह! शायद में कुछ अधिक ही भावुक हो गया)
आराम करके, नहाया, खाना खाया और 2 घंटे सोगया।
शाम को प्रभांशु जी खुद दरवाजा नोक करके चाय के लिए हमे उठा कर ड्राइंग रूम में ले गए, वसीम साहब को भी दूसरे कमरे से बुलवाया और चाय पीने लगे
वो अभी भी हरी जैकेट  पहने हुए हमारा मन मोह रहे थे। हम उनसे बातें तो कर रहे थे लेकिन हमारा ध्यान जैकेट में ही लगा था। कोई कवि मित्र होता तो एक मिनिट में उतरवा लेते और वो तुरंत दे भी देता। हमारे कवि समाज मे यह बात तो है अगर कोई चीज़ किसी के बदन पर है तो वह कोई भी अनुज या वरिष्ठ कवि साधिकार उदारता पूर्वक ले दे सकता है। लेकिन इनसे कैसे कहें कि यह हमें अच्छी लग रही है। इतनी देर में सर्वेश अस्थाना भी आगये। दिवंगत नीरज जी की बहुत सारी बातें हुईं।क्यो कि नीरज जी प्रभांशु जी को भी अपना मानस पुत्र मानते थे।
बहरहाल, प्रोग्राम का समय होता जा रहा था इसलिए सब अपने अपने कक्षो में तैयार होने चले गए।
20 मिनिट बाद मैं तैयार होकर बाहर के कक्ष में आगया, 2 मिनिट बाद प्रभांशु जी बंद गले के कोट में सजे हुए गले के पास का हुक लगाते हुए बाहर आये। मुझसे बोले विष्णु जी नया सूट है ज़रा लगाओ तो इसे। हमने अपने दिल की बात रखने का सही वक्त समझा और हुक लगाते हुए कहा - सर आज जो हरी जैकेट पहने हुए थे बहुत सुंदर लग रही थी। हमारा मन आगया है उस पर।
इस बात पर मुस्कुराकर बोले- तुम्हे चाहिए तो तुम ले लो।
इस जबाब को सुनकर हम झूम उठे, सोच लिया अब तो हरी जैकेट हमारी हो जाएगी। प्रोग्राम के लिए देरी हो रही थी इसलिए सोचा लौट कर यहीं तो आना है वापस आकर ले लेंगे।
शानदार कार्यक्रम हुआ। हरी जैकेट के उत्साह में हमारी प्रस्तुति भी सर्वोत्कृष्ट रही। वापस आकर जब हमें जिलाधिकारी श्री प्रभांशु श्रीवास्तव ने अपने आवास से विदा किया तो हमने अंतिम तगादा किया-  सर हमारी ग्रीन जैकेट।
प्रभांशु जी बहुत जोर से हंसे और बोले विष्णु तुम पर और तुम्हारी प्रस्तुति पर ऐसी 10 जैकेट कुर्बान। हम तुम्हे नई जैकेट दिलवाएंगे एक नहीं वो भी दो। हम कोरियर से घर भिजवा देंगे। लेकिन अपनी पहनी हुई जैकेट देना हमे शोभा नहीं देगा। न देने का एक विशेष कारण और है, वो ये कि तुम कवियों का कोई भरोसा नहीं, कहीं मंच से ये न कह बैठो- श्रोताओ देश में मैं एक ऐसा कवि हूँ जिसे एक जिलाधिकारी के कपड़े उतरवाने का श्रेय जाता है। इस बात पर हम दोनों ज़ोर से हँसे और विदा करते हुए  कार का दरवाजा खोलते हुए बोले विष्णु जी आप उस सीट पर बैठो मेरी गाड़ी में जिस सीट पर मैं बैठता हूँ। मेरा सुरक्षा जवान आपको आपकी ट्रेन में बिठाकर आएगा। रास्ते भर हम एक दिन के गोंडा जिले के बादशाह बन कर अपने आप पर इतराते हुए ट्रेन में बैठकर अपने घर आगये और कोरियर से हरी जैकेट का इंतज़ार कर रहे हैं। आएगी ज़रूर इतना मुझे अपने आप पर विश्वास है।
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संस्मरण - एक फ़ेन पुलिस अधिकारी

इसे पूर्व जन्मों का प्रताप कहूँ या बड़ो का आशीर्वाद कुछ समझ मे नही आता है। एक पुलिस अधिकारी जो पिछले 20 वर्षो से मुझे दूर से कवि सम्मेलनों में सुनता रहा, मुझे चाहता रहा, मुझे फॉलो करता रहा, और मुझे देवता मानता रहा, लेकिन कभी बात नही हुई। जब से फेसबुक और यू ट्यूब आया तब से रात रात भर मुझे सुनने लगा और गत 2 वर्षों से फोन पर वार्तालाप तथा वाटस एप पर चेटिंग कर अपना आदर प्रस्तुत करता रहा। उसके लिए कल शनिवार दिनांक 10 जनवरी के दिन किसी त्योहार से कम नही था जब गोमती नगर के विपुल खंड में होने वाले कवि सम्मेलन में उसे मुझसे मिलने आना था। अपनी ड्यूटी आदि दायित्वों को सही से समायोजन करने के बाद जब रात के साढ़े ग्यारह आलमबाग से गोमती नगर आये तो मेरा काव्यपाठ समाप्त हो चुका था। लेकिन कवि सम्मेलन समाप्ति के बाद जब वह भीड़ को चीरते हुए मंच पर आए और मेरे पास आकर ज़ोर से सेल्यूट मारा और मेरे पैर छुए तो मुझे उन्हें पचानाने में बिल्कुल परेशानी नही हुई। मैंने फिर भी पूछने के अंदाज़ में कहा- नीरज द्विवेदी? तो वो बोले यस सर। उनका पहला वाक्य था - सर आप मेरे अभिताभ बच्चन हो, और आज अपने हीरो के सामने खड़े होकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। छरहरा से सुंदर नोजवान भावुकता भरी मुस्कान समेटे, उसका झटके से सेल्यूट मारना मुझे अंदर तक भिगो गया। मुझे ऐसा लगा जैसे विपुल खंड के तमाम श्रोता और सभी कवियों के सामने मानो मेरा कद बहुत ऊंचा होगया हो। लेकिन वह पुलिस का अधिकारी निश्चल भाव से मुझे घूरे जा रहा था और मैं लगातार प्रशंसक श्रोताओ के साथ सेल्फी खिंचवाने में न चाहते हुए भी व्यस्त हो रहा था। जैसे हो थोड़ा सा स्पेस मिलता मैं उससे बात करने लग जाता। जैसे तैसे मंच से नीचे उतर कर उसके साथ पार्क से बाहर आया तो उसने बताया कि अपने सारे दायित्वों को दरकिनार कर आपसे मिलने का सपना मुझे इतनी दूर खींच लाया है सर, कल आप मेरे साथ रहिये। मैने विवशता बताते हुए कहा कि कल मुझे सहित्यगन्धा के सम्मान समारोह में शाम 6 बजे तक व्यस्त रहना है इसलिए मुश्किल होगा। तो वह बोले कोई बात नही सर आप मुझे जगह बता दीजिए मैं वहां से आपको ले लूँगा आप मेरे साथ डिनर करिये फिर मैं आपको जहाँ कहेंगे छोड़ दूंगा। मैने जैसे ही स्वीकृति दी तो उन्होंने एक बार फिर मेरे पैर छू लिए और चलने को जैसे ही तैयार हुए तो एक बार फिर से पुलिसिया सेल्यूट मारा तो मैंने उन्हें आगे बढ़ कर सीने से लगा लिया। इसके बाद भी वह फिर तब तक वहां से नहीं गए जब तक मुझे विदा नही कर दिया। मेरी कर का गेट खोला मुझे बिठाया, फिर बंद किया और एक बार फिर सेल्यूट मारा, हमारी कार आगे बढ़ गयी तब वह गए।

अगले दिन साहित्य गंधा का सम्मान समारोह राज्यपाल के आने के कारण समय से सम्पन्न हो गया। ठीक 6 बजे नीरज द्विवेदी का फोन आगया- बोले सर मैं कितनी देर में आजाऊँ आपको लेने? मैने कहा आप तुरंत आजाओ। आलमबाग से गोमतीनगर की दूरी अधिक होने के कारण लगभग 1 घंटे बाद वो एक कांस्टेबल के साथ मुझे लेने होटल आगये। मेरे साथ आज की सम्मानित कवियत्री रुचि चतुर्वेदी भी चलने को तैयार हो गईं। क्यो कि संयोग से उन्हें भी उसी स्थान पर आना था। गाड़ी में जब बैठे तो उन्होंने कांस्टेबल के हाथ से चाबी लेकर कहा, लाओ सर के लिए आज गाड़ी हम खुद चलाएंगे और यह कह कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। मुझे उनके इस आदर भाव पर स्नेह आगया और मैं उनके बराबर वाली सीट पर बैठ गया। रास्ते भर बहुत सारी बातें करते आये वो, अपने घर परिवार की भी बातें कीं। उन्होंने बताया कि मेरी वाइफ के दो ही दुश्मन हैं, एक आप और दूसरी सोनाली बेंद्रे। मैं ड्यूटी के बाद घर पर सिर्फ आपके गीत सुनता हूँ या सोनाली बेंद्रे की फिल्में देखता हूँ। रास्ते भर निश्छलता पूर्वक मुझे लखनऊ के प्रसिद्ध मार्केट, जगहों के बारे में इस तरह बताते आये जैसे मैं पहली बार इन रास्तों से गुजर रहा हूँ मैं भी भोला बन कर देखता चला आया। आलमबाग क्षेत्र में प्रवेश करते ही जैसे ही जाम से सामना हुआ तुरंत फोन करके रास्ता साफ कराया गया। मैंने यूं ही मज़ाक में कहा, देखिए आज हमारी कीमत किसी मंत्री से कम नही है जो पुलिस के इतने बड़े अधिकारी हमारे लिए गाड़ी ड्राइव कर रहे हैं और आगे से आगे रास्ता भी साफ हो रहा है इस पर नीरज बोले नहीं सर आपका ओहदा उनसे भी ऊपर है किसी मंत्री की गाड़ी एक कांस्टेबल या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से ऊपर नही चलाते। यहां तो आपके लिए मैं गाड़ी चला रहा हूँ।

आलमबाग मोड़ पर अधिक जाम था तो साथी कांस्टेबल ने उतर कर अपनी गाड़ी को आगे निकाला। 2 किलोमीटर चलने के बाद आलमबाग बस स्टेशन के सामने जिस होटल में हमारे डिनर की व्यवस्था की गई थी उसके सामने जैसे ही गाड़ी रुकी एक नवयुवक बदहवास सा मोटर साइकिल पर आया और मुझे कार का शीशा नीचे करने को कहा। मैने बिना डर के शीशा नीचे कर दिया क्यो कि मेरे साथ तो पुलिस बैठी थी। मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता था। जैसे ही शीशा नीचे हुआ वो बोला -सर आप विष्णु सक्सैना हैं? मैने कहा-हाँ तो हाथ अंदर करके पैर छूते हुए बोला- सर पीछे 2 किलोमीटर से पीछा करता आरहा हूँ आपकी गाड़ी का जब वह जाम में रुकी थी। वहीं मेने आपको पहचान लिया था, लेकिन कन्फर्म नहीं था, सोचा आप इस गाड़ी से कहीं न कही तो रुकेंगे वहीं आपसे पूछ लूँगा। तो आपके पीछे चला आया। सर मैं आपका बहुत बड़ा वाला फेन हूँ। आपको बहुत सुनता हूँ यूट्यूब पर। इस बात पर नीरज बोले देख लिया सर आपके कितने मुरीद हैं आपको पता ही नहीं।

हम लोग होटल में जैसे ही प्रवेश हुये उसका रिसेप्शनिस्ट मुझे शायद पहले से जानता था। जल्दी से एक सेल्फी ली , कमरा खुलवाया, खाने का ऑर्डर दिया। थोड़ी देर में ही नीरज के बोस कोतवाल आलमबाग श्री ब्रजेश सिंह जी मुझसे मिलने आगये। उन पर ज़िम्मेदारियाँ अधिक होती हैं। इसलिए अधिक देर न रुक सके लेकिन जितनी देर रहे गदगद रहे। उनके जाने के बाद नीरज बोले- सर मेरे साहब आप से मिलने आये मेरे लिए ये दिवाली का सबसे बड़ा गिफ्ट है आज। खैर, खाना आया , हम दोनों में से किसी को भूख नही थी फिर भी नीरज की मुहब्बत का मान रखने के लिए एक एक रोटी खाई और गाड़ी पकड़ने के लिए चल दिए अपने गंतव्य को। गाड़ी छूटने में सिर्फ 5 मिनिट रह गईं थी। जल्दी से मुझे एक जगह खड़ा करके खुद ही भागदौड़ कर के सही प्लेटफार्म पर मुझे ले गए मुझे सकुशल मेरी सीट पर बिठाया जब मुझसे विदा हुए मेरे पैर छुए और जैसे ही मैंने उन्हें गले लगाया तो मैं भी भावुक हो गये और वो भी। हम दोनों में एक दूसरे के चेहरे की तरफ देखने की हिम्मत नही हो रही थी। अगर देख लेते तो शायद आंसुओ को रोक नहीं पाते। हम दोनो फिर भी अंदर से भीगे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे हमारे और उसके बीच मे कोई पूर्व जन्म का रिश्ता जुड़ा हुआ है। नीरज ने एक बार फिर सेल्यूट मारा और बिना कुछ कहे मुड़ कर चल दिये। अगले दिन रुचि चतुर्वेदी ने मुझे फोन पर बताया कि आपसे अलग होने के बाद जब वह आये तो लिट्रेली उनकी आंखों से आँसू झर रहे थे। वो सच मे आपके निश्छल भक्त हैं। उनके इस समर्पित भाव को देखकर मैं कल से अभिभूत हूँ जब तक आप उनके साथ रहे उन्होंने अपनी ड्यूटी की भी परवाह नहीं की उन्होंने आपकी सेवा ही अपनी ड्यटी समझी। उन्होंने 10 बजे मुझे भी सकुशल गाड़ी में बिठाया तब गए।


अद्भुत तनजानिया ( संस्मरण ) भाग-4

15 जनवरी 2018


आज हमारा विदाई का दिन था। कुछ सामान रात को ही पैक कर लिया था शेष सुबह उठकर जल्दी जल्दी समान जमाया। कल की ट्रिप से कोई संतुष्ट नहीं लग रहा था। न ही जितेंद्र, न ही शिवि और न ही स्वयं पाठक जी। आज सोमवार था, काम का दिन, आज बॉस आने वाले है इसलिए जितेंद्र ने कल ही हमसे विदा ले ली थी।  बहुत भावुक थे जब वो हमसे जुदा हुए । इन तीन दिनों में जितेंद्र ने हम लोगो का साथ एक पल को भी नहीं छोड़ा। खूब सहयोगी भूमिका में रहे, संस्था के लिए भी और हमारे लिए भी।


आज साढे नो बजे हम लोग नाश्ता करके अपना सामान लेकर नीचे आगये। यूँ हमारी फ्लाइट शाम को 5 बजे थी लेकिन पाठक जी शायद कल की कमी पूरी करना चाहते थे। दोनों गाड़ियों में जैसे ही समान रखना शुरू किया तभी तरुण वशिष्ठ जी होटल में आगये। और घर चलने का आग्रह करने लगे। उन्होंने बताया उनका बेटा बीमार है और वो हम लोगों से मिलना चाहता है। मैं खुद को रोक नहीं सका ये सुनकर। प्रवीण और पाठक जी की सहमति ली और सभी लोग चल दिये उनके आवास पर। रास्ते मे हम टेम्पल स्ट्रीट से गुजरे। तंजानिया देश मे इस मार्ग पर मंदिर, मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा सभी हैं। आर्य समाज का बहुत बड़ा स्थान है। हम लोग एक भव्य मंदिर में प्रवेश हुए बहुत बड़े क्षेत्रफल में यह बना हुआ है। यहां राम, कृष्ण, शिव, गणेश, तिरुपति, जगन्नाथ आदि के मंदिर हैं। सभी की बहुत भव्य प्रतिमाएं हैं। क्रमशः सभी का आशीर्वाद लेकर हम लोग तरुण जी के आवास पर गए उनके बेटे को देखने। जैसे ही उसे मालूम हुआ हम लोग उससे मिलने आने वाले हैं। अपने बिस्तर से उठ बैठा  और हमारे साथ फोटो लेने के dslr केमरा तैयार कर लिया। 10 मिनिट उनके घर बैठे , शर्बत पिया और आगे के लिए चल दिये।


हमारे थोड़ी देर के लिए ही आने से उनके परिवार के चेहरे पर रौनक आगयी। शिवि हमारा समान लेकर अपने प्रतिष्ठान जा चुके थे। अब हम लोग और पाठक जी ही रह गए। हमने पूछा कि अब हम लोग कहाँ जा रहे हैं। तो पाठक जी ने रहस्य खोला कि कल आप को हम ठीक से घुमा नहीं पाए थे इसलिए आज हम आपको यहां के सबसे खूबसूरत रिसोर्ट  और सबसे खूबसूरत बीच पर ले जा रहे हैं। आज आप के पास 3 घंटे है खूब सागर की लहरों के आनंद लीजिये यहां के समंदर से आपको भय नहीं लगेगा। यहीं हम लोग लंच लेकर आगे बढ़ेंगे।
25 मिनिट की ड्राइव के बाद हम लोग उस खूबसूरत जगह आगये जिसका जिक्र अभी किया गया।







वास्तव में बहुत सुंदर रिसोर्ट था। बहुत सुंदर जगह। किसी गुजराती का था शायद। हम लोगों ने अपने नहाने के कपड़े पहने और चल दिये बीच की तरफ। सचमुच बहुत लुभावना बीच था। आज आश्चर्य की बात ये की 70 वर्षीय देवेंद्र पाठक जी भी तैरने की मुद्रा में आ गये थे। उन्हें देख कर मुझ जैसे न तैरने वाले को भी हौसला मिला। समंदर में जाने से पहले नारियल वाला दिखाई दे गया। सबसे पहले एक एक नारियल पानी पिया, गला तर किया। 





फिर पांचों लोग समंदर में प्रवेश करने लगे। ये किनारा बहुत गहरा नहीं था इसलिए देवेंद्र जी तो बहुत अंदर तक चले गए उनके उकसाने पर प्रवीण भी उनके साथ चले गए लेकिन हम तीन डरपोक घुटने तक पानी मे ही जाकर नहा लिए। बहुत मज़ा आया। बहुत देर जल क्रीड़ा की।

 





फिर स्विमिंग पूल में फ्रेश पानी से नहाने के बाद कुछ तारो ताज़ा हुए। आज लग रहा था तंजानिया में आकर कुछ विशेष आनंद आ रहा है। संजना अक्सर बच्ची की तरह व्यवहार करती थी जब भी अलग अलग पोज बनाकर फोटो खिचाती थी तो बहुत भली लगती थी।








अगर एक बात सच कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी। अगर संजना और वंदना हम लोगों के साथ न होतीं तो शायद हम इतना सब कुछ घूम भी न पाते। इन लोगों के घुमाने के चक्कर मे हम लोगों ने तंजानिया की आबो हवा देख ली। हम लोग विदेश इतना घूम चुके हैं कि अब कोई नई चीज देखने के प्रति कोई उत्सुकता नहीं है। इसलिए हम इन दोनों नारियों के बहुत आभारी हैं। जिन्होंने हमे तंजानिया घुमा दिया।

समय खिसकता जा रहा था। लंच का ऑर्डर नहाने से पहले जी दे दिया था। नहाने के तुरंत बाद तेज भूख लग रही थी। लंच भी तैयार था। भरपेट भोजन कर हम लोग देवेंद्र जी के प्रतिष्ठान पहुंच गए। यहाँ पैनल बनाये जाते है। जो कई देशों में भेजे जाते हैं। बहुत बड़ा कारोबार है इनका। सोलर पैनल से खुद की बनाई बिजली से ही काम करते हैं। ये पूरा व्यवसाय शिवि देखते हैं। पाठक जी का तो सिर्फ सुपरविजन है। शिवि बहुत समझदार, योग्य और सहृदय युवा हैं। कविता की कद्र करना जानते हैं प्रभु ऐसा एक एक पुत्र सबके घर मे दे।

अब हमारे एयर पोर्ट जाने का वक्त हो आया था। दो गाड़ियों और हम, हमारा सामान लेकर एयरपोर्ट के लिए रवाना होगये। थोड़ी देर में ही एयरपोर्ट आगये। मन तो नहीं कर रहा तो कोई किसी को छोड़े। लेकिन हम स्थायी निवासी नहीं थे वहां के इसलिये भारत तो आना ही था। इन चार दिनों में देवेंद्र जी ने हमे पिता या अभिभावक जैसा स्नेह दिया, और शिवि ने एक दोस्त की भूमिका निभाई। कुल मिलाकर सब कुछ अविस्मरणीय रहा। सबने गले लगकर चरण स्पर्श कर हमें विदा किया। और तब तक एयरपोर्ट पर रहे जब तक हम बोर्डिंग गेट पर नहीं पहुँच गए।

इसी बीच एक दुर्घटना हो गयी। एयरपोर्ट के अंदर घुसते ही सामान की जांच के साथ साथ व्यक्ति की जांच भी होती है यहां कुछ अधिक ही सतर्कता वरत रहे थे जैसी दुबई में थी। महिलाओं के मेटल की हर चीज उतरवा ली गयी। हम लोगों के पर्स, बेल्ट मोबाइल, घड़ी। आदि सब। भीड़ बहुत थी इसलिए जल्दी जल्दी सामान समेटा। प्रवीण को एक बैग से दूसरे बेग में सामान शिफ्ट करना था। जिसे लगेज में देना था। ये प्रक्रिया पूरी की बोर्डिंग पास लिया और सुरक्षा जांच के लिए फिर वही प्रक्रिया। एक पल को तो झुंझलाहट होने लगी। खैर ये एक प्रक्रिया है सभी को गुजरना पड़ता है इससे। हम लोग अपने समय से लगभग एक घंटे पहले बोर्डिंग गेट पर पहुच गए। हिंदुस्तानी व्यक्ति को जैसे ही समय मिलता है मोबाइल से खेलने लगता है। मैं और वंदना अपनी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल के फोटो चेक करने लगे। हमे देख कर प्रवीण को सूझा मैं भी देख लूँ। लेकिन देखा तो मालूम हुआ कि मोबाइल है ही नहीं। बेग की सभी जेब तलाशीं, कहीं नहीं। संजना का बैग देखा, उसमें भी नहीं मिला तो प्रवीण के चेहरे पर चिंता झलकने लगी। मैने पूछा तो उसने कारण बताया। मैंने ढांढस बंधाया, हो सकता है बैग में सामान शिफ्ट करते वक्त जल्दी में उधर चला गया हो। लेकिन उसे शक था ये पहली सुरक्षा जांच में वहीं रह गया। अब नियमानुसार वापस लौट नहीं सकते थे लेकिन हम लोगों ने अधिकारियों से परमिशन ले ली। और हम दोनों अंतिम सुरक्षा पॉइंट पर पहुच गए। अपनी बात रखी तो अधिकारी ने ध्यान से सुनी। पहले हम सब के चारों बेग का एक्स रे किए। जब नही ट्रेस हुआ। तो हमने निवेदन किया कि पहले वाले पॉइंट पर हमें चेक कर लेने दें तो उन्होंने मना कर दिया, अपने अधिकारी को भेजा और चेक करवाया। लेकिन वहां भी कोई लावारिस मोबाइल नहीं मिला। अब चिंता बढ़ने लगी। अधिकारियों ने इतना सहयोग किया कि सीसीटीवी कैमरे तक से चैक करा लिया लेकिन कोई सूत्र नहीं मिला। निराश होकर हम लोग वापस आगये। प्रवीण बहुत परेशान थे। होते भी क्यों न। कविता के अलावा उनका कारोबार बड़ा है। अनगिनत कॉन्टेक्ट, लोगों का लेन देन, कविताएं आदि सब कुछ था उस मोबाइल में।

मैंने बहुत सांत्वना दी और भरोसा दिया कि भारत मे जब सामान खोलोगे तो ज़रूर मिल जाएगा। ख़ैर फ्लाइट का समय हो गया । इस अंतिम प्रकरण से बोझिल मन लिए हम जहाज में बैठ गए। 5 घंटे की यात्रा थी दुबई तक की।  भोजन किया, फिल्में देखीं थोडा सोये। फिर आगया दुबई। वही खूबसूरत दुबई एयरपोर्ट।










भारत के समयानुसार रात के 2 बजे थे इसलिये आंखों में नींद भरी हुई थी। यहां से 4 बजे उड़ना था। एयरपोर्ट घूमते घूमते कब 2 घंटे कट गये पता ही नहीं पड़ा। अगली फ्लाइट का समय हो गया। हम लोग फिर से उसी जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद जहाज में आकर बैठ गए। इस बार तो बैठते ही नींद आगयी और हम लोगों की आंख तब खुली जब जहाज टर्मिनल 3 पर लेंड हुआ। जहाज से उतर कर बेल्ट से सामान लिया। प्रवीण ने सबसे पहले अपना सामान इस उम्मीद से चेक किया शायद मोबाइल मिल जाये  लेकिन दुर्भाग्य कि उम्मीद टूट गयी, मोबाइल नहीं मिला। अब तो सब्र के अलावा कोई चारा नहीं था। इन चार पांच दिनों की सभी स्मृतियां समेटे हम सबने एक दूसरे से गले लग कर अपने अपने गंतव्य के लिए विदा ली। 

लेकिन चलते वक्त हमने जब संजना से पूछा कि कैसी लगी तुमको ये विदेश यात्रा। तो मुस्कुराकर वंदना की तरफ मुंह करके बोली- इन्होंने (प्रवीण की ओर इशारा करते हुए) ने करा दी तो कर ली वर्ना हम तो घर बैठे ही थे, क्यो भाभी जी? उसके यह कहते ही हम सब लोग खिलखिला कर हंस पड़े क्यो की संजना का यह वाक्य पूरी यात्रा में हमे आनंद देता रहा था।