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संस्मरण- हरी जैकेट

*******हरी जैकेट********

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है। 20 नवंबर को उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में जाना हुआ। वहां के जिलाधिकारी कैप्टन श्री प्रभांशु जी के आमंत्रण पर एक कॉम्पेक्ट काव्यसंध्या का आयोजन किया गया था। प्रभांशु जी आगरा और अलीगढ़ में अपर जिलाधिकारी रह चुके हैं इसलिए पूर्व परिचित थे। मेरे अलावा श्री वसीम बरेलवी,श्री कुंवर बेचैन, सरिता शर्मा और सर्वेश अस्थाना। मुझे ट्रेन से ही जाना था इसलिए एक दिन पहले मैंने उन्हें फोन किया कि सर स्टेशन किसी को रिसीव करने भेज देना। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि आप चिंता न करे स्टेशन पर सिटी मजिस्ट्रेट आपको रिसीव करेंगे। वैसे तो मैं आता लेकिन मेरी मीटिंग है इसलिए वो आपको लेने आएंगे। समय से एके घंटे लेट मेरी ट्रेन गोंडा स्टेशन पहुँची। सिटी मजिस्ट्रेट साहब एक गुलदस्ता लिए मेरे कोच के सामने खड़े थे। इस तरह कोई यात्रा समाप्ति पर मिल जाये तो समझ लो यात्रा की थकान फुर्ररर। जैसे कि हम लोगों की आदत होती है हर चीज के लिए पहले आश्वस्त होना चाहते है। उसी के मद्दे नज़र मैं पूछ बैठा- सर हम लोगों के लिए जो होटल किया गया है वह ठीक है?  उन्होंने बताया बहुत अच्छा है सब कुछ। रास्ते मे ही जिलाधिकारी महोदय का फोन आया कि इन्हें सीधे मेरे घर पर लाया जाए। सिटी मजिस्ट्रेट साहब बोले सर अब होटल जाने से पहले साहब के घर जाना होगा उन्होंने बुलाया है। गाड़ी जिलाधिकारी के बंगले की तरफ दौड़ने लगी। भव्यतम प्रवेश के बाद आलीशान बंगले में दाखिल हुए तो अंदर से नोकर आया बोला साहब ने अंदर ही बुलाया है। मैं अंदर गया तो देखा यह तो डाइनिंग हाल है। प्रभांशु जी दौड़ कर आये और गले लगा लिया कुशल क्षेम पूछी, डाइनिंग टेबल तक ले गये तो देखा वसीम साहब बैठे नाश्ता कर रहे थे। उन्हें अभिवादन किया, और कुर्सी पर बैठ गया। तुरंत मेरे लिए भी नाश्ता आया। भूख तो बहुत जोर की लगी ही थी देखते ही देखते 2 पराठे उदरस्थ कर लिये। प्रभांशु जी बहुत दिनों बाद मिले थे, लेकिन उनके अंदर का कुछ भी नही बदला था, वही हंसी, वही फुर्ती, वही स्मार्टनेस। आज तो हरी जैकेट में बहुत सुंदर और हरे भरे लग रहे थे। पहली ही नज़र में जैकेट इतनी भा गयी कि कह दूं कि ये मुझे दे दो। लेकिन यह कहना अशिष्टता लगी और मन को समझा लिया। तभी प्रभांशु जी बोले- विष्णु जी आप होटल में नहीं रुकेंगे। आप हमारे अतिथि हैं इसलिए हमारे आवास पर ही रहेंगे। ये सामने वाला रूम आपका है। खूब आराम करिये, नहाइये, फिर लंच लीजिये, जो मन हो बनवाइये, पूरा बंगला आपके हवाले है आप मालिक हैं। मैं शाम को मिलता हूँ मेरी कुछ ज़रूरी मीटिंग्स हैं। उन्हें निपटा लूँ। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। इस तरह किसी जिलाधिकारी के आवास पर रुकने का अपनत्व भरा मेरा यह पहला अनुभव था। तभी कुक ने पूछा आप लोग लंच कितने बजे लेंगे। वसीम साहब तपाक से बोले- देखिए भाई मैं तो इतना खा चुका हूँ कि अब लंच की गुंजायश नहीं बची। तभी मैंने सोचा कहीं वसीम साहब की बात ये कुक सही न मान ले और लंच की छुट्टी कर दे।
मैंने तुरन्त ही कहा- भैया मैं तो करूंगा...।
सर कितने बजे?
मैंने कहा-2 बजे।
क्या बनाऊं?
-लौकी की सब्जी ( सुन कर कुक की त्योरियां चढ़ीं,)
सर,दाल?
मैंने कहा-मूँग मसूर की कोई भी चलेगी।  अजीब सा मेन्यू सुनकर
कुक परेशान सा हुआ और अंदर चला गया। मुझे लगा ये एक जिलाधिकारी के कुक के लिए मुश्किल भरा टास्क था।
मुझे उसकी परेशानी आनंद देने लगी अगले ही पल मुस्कुराते हुए प्रभांशु जी बाहर निकल गए और हम मुस्कुराते हुए अपने कमरे के अंदर।
कमरा क्या था पूरा 30×30 का हाल था। सारी सुविधाओ से सुसज्जित। बाथरूम, बाप रे बाप इतना बड़ा की व्यक्ति भाग भाग कर नहाए।
लेकिन हर पल यह अनुभूति होती रही कि हम जिलाधिकारी के भव्य आवास में अतिथि हैं। बार बार प्रभु को धन्यवाद देना का मन करता, भगवान ने है हमें कविता की सौगात देकर संसार के सारे सुख दे डाले हैं और क्या चाहिए। सुशील पत्नी दे दी, दो आज्ञाकारी बेटे दे दिए, सारी संपन्नता, सम्मान, इज़्ज़त और क्या चाहिए....सही मायने में मुझे ऊपर वाले से कोई शिकायत नहीं है। बस एक कसक है कि माँ के आंखों ने तो यह सब देख लिया लेकिन पिता की आंखे ये सब कुछ न देख पायीं वो इस संसार से बहुत पहले ही कूच कर गए।(ओह! शायद में कुछ अधिक ही भावुक हो गया)
आराम करके, नहाया, खाना खाया और 2 घंटे सोगया।
शाम को प्रभांशु जी खुद दरवाजा नोक करके चाय के लिए हमे उठा कर ड्राइंग रूम में ले गए, वसीम साहब को भी दूसरे कमरे से बुलवाया और चाय पीने लगे
वो अभी भी हरी जैकेट  पहने हुए हमारा मन मोह रहे थे। हम उनसे बातें तो कर रहे थे लेकिन हमारा ध्यान जैकेट में ही लगा था। कोई कवि मित्र होता तो एक मिनिट में उतरवा लेते और वो तुरंत दे भी देता। हमारे कवि समाज मे यह बात तो है अगर कोई चीज़ किसी के बदन पर है तो वह कोई भी अनुज या वरिष्ठ कवि साधिकार उदारता पूर्वक ले दे सकता है। लेकिन इनसे कैसे कहें कि यह हमें अच्छी लग रही है। इतनी देर में सर्वेश अस्थाना भी आगये। दिवंगत नीरज जी की बहुत सारी बातें हुईं।क्यो कि नीरज जी प्रभांशु जी को भी अपना मानस पुत्र मानते थे।
बहरहाल, प्रोग्राम का समय होता जा रहा था इसलिए सब अपने अपने कक्षो में तैयार होने चले गए।
20 मिनिट बाद मैं तैयार होकर बाहर के कक्ष में आगया, 2 मिनिट बाद प्रभांशु जी बंद गले के कोट में सजे हुए गले के पास का हुक लगाते हुए बाहर आये। मुझसे बोले विष्णु जी नया सूट है ज़रा लगाओ तो इसे। हमने अपने दिल की बात रखने का सही वक्त समझा और हुक लगाते हुए कहा - सर आज जो हरी जैकेट पहने हुए थे बहुत सुंदर लग रही थी। हमारा मन आगया है उस पर।
इस बात पर मुस्कुराकर बोले- तुम्हे चाहिए तो तुम ले लो।
इस जबाब को सुनकर हम झूम उठे, सोच लिया अब तो हरी जैकेट हमारी हो जाएगी। प्रोग्राम के लिए देरी हो रही थी इसलिए सोचा लौट कर यहीं तो आना है वापस आकर ले लेंगे।
शानदार कार्यक्रम हुआ। हरी जैकेट के उत्साह में हमारी प्रस्तुति भी सर्वोत्कृष्ट रही। वापस आकर जब हमें जिलाधिकारी श्री प्रभांशु श्रीवास्तव ने अपने आवास से विदा किया तो हमने अंतिम तगादा किया-  सर हमारी ग्रीन जैकेट।
प्रभांशु जी बहुत जोर से हंसे और बोले विष्णु तुम पर और तुम्हारी प्रस्तुति पर ऐसी 10 जैकेट कुर्बान। हम तुम्हे नई जैकेट दिलवाएंगे एक नहीं वो भी दो। हम कोरियर से घर भिजवा देंगे। लेकिन अपनी पहनी हुई जैकेट देना हमे शोभा नहीं देगा। न देने का एक विशेष कारण और है, वो ये कि तुम कवियों का कोई भरोसा नहीं, कहीं मंच से ये न कह बैठो- श्रोताओ देश में मैं एक ऐसा कवि हूँ जिसे एक जिलाधिकारी के कपड़े उतरवाने का श्रेय जाता है। इस बात पर हम दोनों ज़ोर से हँसे और विदा करते हुए  कार का दरवाजा खोलते हुए बोले विष्णु जी आप उस सीट पर बैठो मेरी गाड़ी में जिस सीट पर मैं बैठता हूँ। मेरा सुरक्षा जवान आपको आपकी ट्रेन में बिठाकर आएगा। रास्ते भर हम एक दिन के गोंडा जिले के बादशाह बन कर अपने आप पर इतराते हुए ट्रेन में बैठकर अपने घर आगये और कोरियर से हरी जैकेट का इंतज़ार कर रहे हैं। आएगी ज़रूर इतना मुझे अपने आप पर विश्वास है।
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