मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाऊँगा जिस जगह जाओगे तुम मुझे छोड़ कर अश्क पी लूँगा और ग़म उठा लूँगा मैं सारी यादों को सो जाऊंगा ओढ़ कर, जब भी बारिश की बूंदें भिगोयें तुम्हें सोच लेना की मैं रो रहा हूँ कहीं, जब भी हो जाओ बेचैन ये मानना खोल कर आँख में सो रहा हूँ कहीं, टूट कर कोई केसे बिखरता यहाँ देख लेना कोई आइना तोड़ कर; मैं तो जब जब नदी के किनारे गया मेरा लहरों ने तन तर बतर कर दिया, पार हो जाऊँगा पूरी उम्मीद थी उठती लहरों ने पर मन में डर भर दिया, रेत पर बेठ कर जो बनाया था घर आ गया हूँ उसे आज फिर तोड़ कर, [शेष संकलन में]