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द्वार के सतिये..............


जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना,

द्वार के सतिये तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में॥


हाथ से कांधों को हमने थाम कर

साथ चलने के किये वादे कभी,

मन्दिरों दरगाह पीपल सब जगह

जाके हमने बाँधे थे धागे कभी,

प्रेम के हर एक मानक पर खरे थे हम,

बैठ ना पाये न जाने क्यों परीक्षा में |


हम जलेंगे और जीयेंगे उम्रभर

अपना और दिये का ये अनुबन्ध है,

तेज़ आँधी भी चलेगी साथ में

पर बुझायेगी नहीं सौगन्ध है,

पुतलियाँ पथरा गयीं पथ देखते पल-पल,

आँख को शायद मिला ये मंत्र दीक्षा में।


अक्षरों के साथ बंध हर पँक्ति में

याद आयी है निगोडी गीत में,

प्रीत की पुस्तक अधूरी रह गयी

सिसकियाँ घुलने लगीं सँगीत में,

दर्द का ये संकलन मिल जाये तो पढना,

मत उलझना तुम कभी इसकी परीक्षा में।

7 comments:

Anonymous said...

Mat ulaghna tum kabhi iski pariksha mein...bahut khoob!!

Sanklan ki pahli kavita thi...aur ka intezar rahega!

Sandeep Saxena

KRANT M.L.Verma said...

Navgeet ki rachna mein Vishnu Saxena ne man ke taron ko chhua. Vadhai! likhte raho hamare ashish tumhare saath hain.

Dr Krant M.L.Verma
krantmlverma.blogspot.com

डा. विष्णु सक्सेना said...

mera hosala badhaane ke liye dhanyawaad

Shayer Anant Bhardwaj said...

a great salute to my guru....
sir main murid ho gya...
sabse pehle aapki kavita.. "ret par likhoge to..."
suni aur aapse aakar bhi mila....
tab se aksar yahi gungunata hoon..
jald hi darshan karne ka man hai ab..

vivekjshukla said...

Sir bahut pyara geet likhate hair

Vivek j shukla

vivekjshukla said...

Sir bahut pyara geet likhate hair

Vivek j shukla

Anonymous said...

SIR IF U HAVE A BOOK OR CD IN MARKET PLZ TEL ME I FIRST HEARD U IN LAKHIMPUR 2013