आओ बच्चों से ही सीख लें

आइए, बच्चों से ही कुछ सीखें...🧑‍🦱🧑‍🤝‍🧑🤗

उदाहरण-1
गाज़ियाबाद निवासी श्री कृष्ण मित्र जी का प्रपोत्र अगस्त्य उम्र 5 वर्ष। कोरोना की दूसरी लहर में 10 दिन पूर्व उसके पापा पॉजिटिव होगये। वो जिस दिन से घर के एक कमरे में आइसोलेट हुए तो अपने पिता का लाडला होते हुये भी खुद अपने पिता से दूर-दूर रहा, मिलने तक नहीं गया। कुछ दिन बाद उसकी मम्मी भी पॉजिटिव हो गयी तो वह स्वतः ग्राउंड फ्लोर पर अपने दादा दादी के पास सोने लगा। पिछले 3 दिन से श्री कृष्णमित्र जी सपत्नीक पॉजिटिव हुए तो दिन भर उनके कमरे में रहने वाले अगस्त्य ने उनके कमरे से भी मुँह मोड़ लिया। ये सब किसी ने उसे कुछ बताया नहीं स्वयं ही घर मे होने वाली चर्चाओं को अपने अबोध मन में बिठाता रहा। परसों जब उसके दादा उसके परदादा श्री कृष्णमित्र जी के कमरे में उनका हाल जानने चले गये तो उसने अपनी दादी को साफ शब्दों में कह दिया-दादी, दादू बड़े दादू के कमरे में चले गए हैं उनको कोरोना है, अब वो आपके कमरे में आएंगे तो मैं अब आपके कमरे में नहीं आऊंगा। ये कहकर वह पिछले दो दिन से घर के कुक्स (रसोइयों) के साथ ही रह रहा है उन्ही के पास सो रहा है।

उदाहरण-2
मेरे बड़े भाई का घर मेरे घर से 20 कदम दूर पर है। उनके दो पौत्र, व्योम 6 वर्ष, विहान 5 वर्ष। हमारे घर से उन दोनों बच्चों का बहुत लगाव है सामान्य दिनों में अपने घर से अधिक हमारे यहाँ पर रहते हैं, उनका अपनी दादी से अतिरिक्त स्नेह है। जब से कोरोना की दूसरी लहर आयी है तब से बमुश्किल प्रतिदिन एक या दो बार घर से निकल कर आ ही जाते हैं। उन्हें पता है बेवजह घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, लेकिन इधर के प्यार को ज़रूरी वजह मानकर पूरी सावधानियों के साथ घर से बाहर निकल ही आते हैं। दोनों के मुंह पर मास्क होता है। घर के बाहर एक हिस्से में मेरी क्लिनिक है तो सबसे पहले वहां आकर अपने हाथों को सेनिटाइजर से साफ करते हैं। फिर घर मे प्रवेश करने से पहले अपनी चप्पलें बाहर उतरते हैं और सीधे वाशबेसिन पर जाकर अच्छी तरह साबुन से हाथ धोकर अपनी दादी से पूरे चौबीस घंटे का लाड़ एक दो घण्टे में लूट कर अपने घर चले जाते हैं। घर मे अगर वो समाचार देख रही हों तो बड़े प्यार से समझाते हैं दादी ये मत देखा करिये, दिन भर कोरोना देख देखकर आप बीमार हो जाओगी।

तो देखा आपने, हमारे इन अबोध बच्चों का इतना संवेदनशील होना हम बड़ों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। इस भयावह दूसरी लहर के ज़िम्मेदार हम बड़े और समझदार लोग हैं। अगर हम शुरू से ही लापरवाहियां न करके उन सभी प्रोटोकोल्स का पालन करते जो पहले कई बार बताये गए थे तो शायद आज ये दिन नहीं देखने पड़ते। अपने अवगुणों का दोष दूसरों पर मढ़ना आसान हमारी प्रवृत्ति रही है। एक पिता अपनी संतानों पर अपना सर्वस्व निछावर कर देता है लेकिन संताने यही कहतीं रहती हैं तुमने हमारे साथ किया ही क्या है। अगर पिछले वर्ष की अपीलों पर ध्यान दिया होता तो शायद हम इस दूसरी लहर से बच जाते। अभी भी वक्त है। कोविड को मज़ाक मत समझिए। अगर अभी भी नहीं संभले तो हमें तीसरी लहर जो इससे भी अधिक दिल दहलाने वाली होगी उससे हमें कोई नहीं बचा सकता।
ज़िंदगी चलते-चलते ठहरी है।
रात  लगने   लगी  दुपहरी  है।
तैश में घौंसला जला कर अब
सर पकड़ रो रही गिलहरी है।

~ डा. विष्णु सक्सैना

#विष्णुलोक

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