तीरगी दो चार दिन की है

हर तरफ उदासियाँ ही उदासियाँ, अंधेरे ही अंधेरे। नकारात्मकता ने जैसे चारों ओर डेरा डाल दिया हो। हर सुबह सोशल मीडिया पर जाने में डर लगता है। बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक की आंखे रो रो रोकर रीती हो चली हैं। अपनों के खो जाने का जितना गम है उससे अधिक उन हैवानों की पैशाचिक प्रवृत्ति पर घृणा हो रही है जो ऐसे समय मे भी लाशों के ऊपर जश्न मना रहे हैं। अस्पतालों में डमी पेशेंट लिटा कर शो कर रहे हैं कि हमारे यहां कोई बेड खाली नहीं है। जिस मरीज को देख कर लगता है ये लाखों रुपया खर्च कर देगा उसको तुरंत सारी सुविधाएं मुहैया हो जाती हैं। इंजेक्शन की मुंह माँगी कीमत लेने पर नकली इंजेक्शन देने पर भी इनके अंदर की पशुता रोती नहीं है।...दानवो, समय एक जैसा नहीं रहता, हर रात के बाद सवेरा आएगा, हर अंधेरा रोशनी लेकर आता है, हर आंसू के पीछे मुस्कुराहट छिपी रहती है। समय  उनको कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने इस आपदा में मनुजता की खिल्ली उड़ाई है। इतिहास उन्हें याद करेगा जिन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक एक दूसरे की मदद कर इंसानियत को बचा लिया है। अन्य मुद्दों को तो बाद में बैठ कर भी निपटा लिया जाएगा लेकिन इस वक्त मनुजता की रक्षा कैसे हो इस पर सबको विचार करना चाहिए चाहे कोई भी हो। खिड़कियां बंद कर दीं तो रोशनी को तरस जाएंगे हम सब.....

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